वहीं संगठन में रोज-रोज के इस्तीफे से आजिज जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ने गुरुवार को ही जंबो राज्य कार्यकारिणी को भंग कर दिया। फिलहाल संगठन का काम चलाने के लिए चार प्रभारी पदाधिकारी की तैनाती कर दी गयी है।
कार्यकारिणी के ही माध्यम से पार्टी तमाम बड़े कार्यक्रम तय करती है।
इधर, शुक्रवार को वशिष्ठ नारायण ने बागियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कोई पार्टी छोड़कर जाना चाहता है, तो जा सकता है। उन्होंने कहा कि संजय सिंह का प्रवक्ता पद से इस्तीफा मैंने फाड़कर फेंक दिया था, लेकिन वे अड़ गये।
आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू
वहीं ज्ञानू क्त्रसेध, असंतोष और चिढ़ से बिना मतलब की बातें कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि वो किसी को पार्टी से तत्काल बाहर नहीं करेंगे।
इसे बागियों को झटका देने वाला कदम माना जा रहा है। कुल मिलाकर नीतीश कुमार जहां राष्ट्रीय स्तर पर लड़ाई के लिए अपने मोर्चे को मजबूतऔर बड़ा करना चाह रहे हैं, वहीं प्रदेश स्तर पर जदयू में उभरी नाराजगी वो के लाख चाहने के बावजूद सुलझा नहीं पा रहे हैं। ऐसे में कुछ दिन यह मामला आरोप-प्रत्यारोप का यूं ही चलता रहे तो आश्चर्य नहीं।
अपनों के तीर से घायल नीतीश
जदयू में जितनी दवा की जा रही है, मर्ज उतना बढ़ता जा रहा है। हाल यह हो चुका है कि एक की नाराजगी का जब तक इलाज तलाशा जाता है, तब तक दूसरा नाराज हो जा रहा है।
अपनों के तीर से घायल नीतीश न तो अपना बचाव कर पा रहे हैं न ही पार्टी को मझधार से निकाल पा रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोचा था कि मांझी जदयू की नैया आराम से पार लगा लेंगे, लेकिन मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद से ही जो घमासान शुरु हुआ, वो शांत होने का नाम नहीं ले रहा है।
ज्ञानेंद्र ज्ञानू, नीरज कुमार, अजीत कुमार, सलमान, संजय सिंह और पूनम देवी जैसे आधा दर्जन से ज्यादा नेताओं ने बगावती झंडा उठा लिया है। इनमें से संजय सिंह और नीरज कुमार जैसे कुछ नेताओं ने तो संगठन के सभी पदों से त्यागपत्र भी दे दिया है।
नीतीश को विरोध की चिंता नहीं
जो नेता कल तक नीतीश के आगे बोल नहीं पाते थे, वो आज किसी न किसी के बहाने नीतीश पर तीर चलाने से नहीं चूक रहे हैं। वैसे इनके तीर से नीतीश कुमार के नेतृत्व या पार्टी की सेहत पर कोई तात्कालिक असर नहीं पड़ने वाला है, लेकिन पार्टी के लिए यह एक संकटकाल तो है ही।
यही कारण है कि एक ओर जहां पार्टी ने तत्काल किसी नाराज नेता को बाहर का रास्ता नहीं दिखाने का फैसला किया है, वहीं किसी नाराज नेता ने भी पार्टी छोड़ने का दावा नहीं किया है।
वैसे तो बागी नेताओं की नाराजगी मुख्य रूप से ललन सिंह जैसे नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल करने को लेकर है, लेकिन कुछ नेता इस बहाने सीधा नीतीश कुमार पर आरोप लगाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।
बाहरी लोगों को मिल रही तवज्जो
एक ओर जहां नीरज कुमार जैसे नेताओं का आरोप है कि पार्टी के वफादार लोगों की उपेक्षाकर नीतीश पार्टी में बाहरी लोगों को तवज्जो दे रहे हैं, वहीं शुक्रवार को जदयू विधायक रविन्द्र राय ने विधायकों के फोन टैपिंग करने का आरोप लगाते हुए केन्द्रीय मंत्री से इसकी शिकायत करने की बात कही है।
वहीं उन्होंने यहां तक कह डाला कि नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ऩे का फैसला उन्होंने अकेले लिया था।
शुक्रवार को ही विधायक पूनम देवी के घर पर बागी विधायकों की बैठक हुई। यहां ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू भी मौजूद थे। इस मौके पर पूनम देवी ने कहा कि चुनाव हारनेवालों को मनचाहा विभाग मिल गया है। ये सही नहीं है।
कार्यकर्ता उपेक्षा से नाराज
राज्यसभा की एक सीट जदयू के बाहर के लोगों को दिये जाने की सूचना के बाद पार्टी के नाराज नेताओं की यह आशंका और मजबूत हो गयी कि पार्टी में समर्पित कार्यकर्ताओं को आगे भी तवज्जो नहीं मिलने वाला है।
वैसे कल पार्टी में हाल ही में आये अनिल शर्मा ने राज्यसभा जाने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया वहीं राजद छोड़नेवाले दरभंगा के पूर्व सांसद अली अशरफ फातमी का मामला भी तत्काल विचाराधीन रखा गया है।
वैसे जानकार बता रहे हैं कि इस सीट के लिए कांग्रेस के शकील अहमद के नाम की भी चर्चा है, यही कारण है कि कांग्रेस ने लालू नाता तोड़ने पर विचार कर रही है।