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'यह व्यवस्था दलितों को न्याय नहीं दे सकती'

Thu, 10 Oct 2013 03:29 PM IST
दिवाकर /निदेशक, एएन सिन्हा सामाजिक अध्ययन संस्थान, पटना, बिहार
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बिहार के जहानाबाद जिले के लक्ष्मणपुर और बाथे गांव में 58 लोग मारे गए थे, मारे जाने वालों में 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी थे। ऐसे मामले में सभी अभियुक्तों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया जाना न केवल दलितों के खिलाफ है बल्कि इस न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन पर भी एक बडा धब्बा है।
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न्यायलय का यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण और शॉकिंग है। न्यायालय इस बात पर चुप है कि ये 58 लोग कैसे मारे गए और उसके अभियुक्त कौन थे।

अगर यह व्यवस्था इतनी अपंग है कि वो 58 लोगों के नरसंहार का साक्ष्य नहीं खोज पा रही है तो उसे कोई हक नहीं कि वो दलितों और गरीबों को इस संविधान, न्यायालय और पुलिस की दुहाई दे। आखिरकार यह व्यवस्था किस आधार पर गरीबों को इस व्यवस्था पर भरोसा करने को कह सकती है।

हम गर्व करते हैं कि हम सबसे बडे लोकतंत्र हैं लेकिन इस व्यवस्था में दलितों और गरीबों को न्याय नहीं मिला तो वे इस संविधान पर से विश्वास खो देंगे।

मौलिक अधिकार
संसदीय राजनीति की इस प्रक्रिया और इसके संविधान में कहा गया है कि हम एक साथ रहेंगे, हम कोई विभेद नहीं करेंगे, समानता का अवसर होगा।

हमारा पहला मौलिक अधिकार है जीने का अधिकार। इस संसदीय संविधान के तहत यह अधिकार ही सुरक्षित नहीं है।

अगर यह संविधान गरीबों को उनके मौलिक अधिकार की सुरक्षा नहीं दे सकता तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए, इसकी व्याख्या होनी चाहिए।

हमारे देश के राष्ट्रपति कई बार कह चुके हैं कि अगर गरीब तक न्याय नहीं पहुंचेगा तो लोकतंत्र की सुरक्षा नहीं हो सकती।

अगर लोकतंत्र समाज को यह विश्वास नहीं दिलाता है कि यह न्याय व्यवस्था और पुलिस व्यवस्था गरीबों को न्याय और सुरक्षा दे सकता है तो यह लोकतंत्र अपना नैतिक आधार खो देगा।
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अगर लोगों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा तो वो कानून अपने हाथ में लेंगे और लोग कानून अपने हाथ में लेंगे तो समाज में अवव्यवस्था फैलेगी।

साजिश
कुछ लोग इसे जांच व्यवस्था की खामी मात्र बता रहे हैं। इसे खामी तब माना जा सकता था जब कुछ मामले में यह व्यवस्था न्याय करती और कुछ मामलों में काम नहीं करती।

जिस तरह दलितों के नरसंहार के विभिन्न मामले में अभियुक्त बरी होते जा रहे हैं उससे पता चलता है कि यह एक साजिश है।

जब किसी मजदूर को पकडना होता है तो पुलिस के पास ढेरों मुखबिर होते हैं लेकिन जब अमीरों को पकडना होता है तो इनके मुखबिर न जाने कहां चले जाते हैं।

भविष्य की राजनीति
अगर सरकार पुलिस व्यस्था के प्रति सख्ती नहीं बरतती तो दलितों का सरकार से भी भरोसा उठ जाएगा।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके पहले ऐसे ही एक मामले में उच्च न्यायलय के फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय जाने की बात कही थी। सरकार गई भी।

लेकिन यह केवल ऊपरी अदालतों तक जाने का मामला नहीं है।

अगर सरकार केवल उच्चतम न्यायालय में जाकर चुप रह जाती है और ऐसे मामलों की जांच के लिए अपने प्रशासन और पुलिस महकमे पर दबाव नहीं बनाती तो दलित इस सरकार पर से भरोसा खो देंगे और इस सरकार के प्रति दलित का रवैया बदल जाएगा।

मेरा मानना है कि इस फैसले का न केवल बिहार बल्कि पूरे देश की राजनीति पर प्रभाव पडेगा। यह फैसला देश के गरीबों को अपने ढंग से एकजुट होने का आधार देगा जो इस व्यवस्था के खिलाफ खडे होंगे।
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मैं मानता हूं कि भारतीय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन, सुरक्षा और सत्ता का स्वरूप आज भी दलित के पक्ष में न्याय देने की स्थिति में नहीं आ पाया है।

दलित आंदोलन को इसे अपने गहराई और मजबूती से इसे हल कर सकता है। यह व्यस्था इसे मदद करने की स्थिति में नहीं है। यह निर्णय इस बात का एक प्रमाण है।
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