बिहार चुनावों में पहले चरण का मतदान खत्म हुआ तो कई दिग्गजों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई। देशभर में सुर्खियों का केन्द्र बने बिहार चुनाव में वोटरों ने भी इसकी अहमियत को समझा और जमकर मतदान किया।
वोटरों के उत्साह का ही परिणाम था कि पिछली बार के मुकाबले इस बार छह फीसदी ज्यादा मतदान हुआ। जनता के इस उत्साह से बेशक अन्य राजनीतिक दलों की बांछे खिली हुई हैं लेकिन सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड और राष्ट्रीय जनता दल की नींदें उड़ गई हैं।
पिछले विधानसभा चुनावों में पहले चरण में कुल 50.85 फीसदी मतदान हुआ था। ऐसे में पिछली बार की अपेक्षा इस बार 6.15 फीसदी ज्यादा वोटिंग हुई है।
जिन 49 सीटों पर पहले चरण में चुनाव हुआ है उनमें से 34 सीटों पर नीतीश-लालू के महागठबंधन का कब्जा है। ऐसे में इन सीटों को लेकर सबसे ज्यादा चिंता इन्हीं दोनों को है।
वोट प्रतिशत बढ़ने पर लालू नीतीश को उठाना पड़ सकता है नुकसान
जिस तरह से वोटरों ने पहले चरण में बढ़ चढ़कर मतदान किया है उसने दोनों दलों की धुकधुकी बढ़ी हुई है, क्योंकि आमतौर पर वोट प्रतिशत बढ़ने को सत्ता विरोधी रुझान से जोड़कर देखा जाता है। इसी साल हुए हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर और झारखंड चुनावों में भी इसकी नजीर देखने को मिल चुकी है। जहां मतदान के प्रति लोगों के बढ़ते रुझान ने सत्तारूढ़ पार्टियों को सत्ता से बाहर कर दिया था।
पूर्व में हुए दोनों विधानसभा और पिछले साल हुए लोकसभा चुनावों में लालू-नीतीश इस बात का एहसास भी कर चुके हैं। जब लालू यादव के 15 साल के शासन के खिलाफ बिहार की जनता ने बढ़ चढ़कर वोट देते हुए उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था।
दिक्कत ये भी है कि महागठबंधन के विरोधी राजग के पास पहले चरण में खोने के लिए कुछ ज्यादा नहीं है जबकि पाने के लिए काफी कुछ है। राजग के पास पहले चरण की 49 में से केवल 14 सीटें ही हैं। इनमें से भी 13 अकेले भाजपा के पास है।
वोटिंग से एक दिन पहले घूसकांड ने बढ़ाई नीतीश की मुश्किल
पहले चरण को लेकर सत्तारूढ़ दल खासकर नीतीश कुमार की टेंशन इसलिए भी ज्यादा है कि मतदान से एक दिन पहले ही उनके एक मंत्री का रिश्वत लेते स्टिंग सबके सामने आ गया।
हालांकि नीतीश ने आनन फानन में उन्हें बर्खास्त कर डेमेज कंट्रोल करने का प्रयास किया लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दूसरा, अगर डेढ़ साल पहले हुए लोकसभा चुनावों पर भी निगाह डाली जाए तो वहां भी मतदान प्रतिशत बढ़ने पर सत्तारूढ़ जेडीयू को खासा नुकसान उठाना पड़ा था। इसलिए पहले चरण के संकेत लालू-नीतीश के लिए अच्छे नहीं दिख रहे हैं।