मोक्ष की नगरी गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 2026 की शुरुआत 25 सितंबर से होने जा रही है। इस बार पितृपक्ष मेला सामान्य श्रद्धालुओं के लिए 16 दिनों का होगा, जबकि त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु 17 दिनों तक पिंडदान और अन्य कर्मकांड करेंगे। इसकी वजह आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी और नवमी तिथि का एक ही दिन पड़ना है। इस बार देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के गयाजी पहुंचने की उम्मीद है। श्रद्धालु फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट समेत अलग-अलग वेदियों पर पिंडदान और तर्पण करेंगे।
25 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष मेला
बिहार के गयाजी धाम में पितृपक्ष मेला 25 सितंबर, शुक्रवार से शुरू होगा। हालांकि, गयाश्राद्ध की शुरुआत 26 सितंबर से मानी जाएगी। भाद्र शुक्ल पक्ष की अनंत चतुर्दशी के दिन पुनपुन में पिंडदान और गयापाल तीर्थ पुरोहित की पांव पूजा की परंपरा है। अगर किसी श्रद्धालु के लिए पुनपुन में श्राद्ध करना संभव नहीं हो तो गोदावरी श्राद्ध किया जाता है।
इस बार गयाजी में पितृपक्ष मेला मुख्य रूप से 10 अक्टूबर तक चलेगा। वहीं, त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु 11 अक्टूबर तक अपना कर्मकांड पूरा करेंगे।
अष्टमी और नवमी एक ही दिन, इसलिए 16 दिनों का मेला
आमतौर पर पितृपक्ष मेला 17 दिनों का माना जाता है। लेकिन वर्ष 2026 में आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ रही है। इसी वजह से सामान्य रूप से श्राद्ध करने वाले श्रद्धालुओं के लिए इस बार मेला 16 दिनों का होगा। वहीं, त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वालों के लिए इसकी अवधि 17 दिनों की रहेगी।
त्रैपाक्षिक श्राद्ध में तीन पक्षों तक पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया जाता है। गयाजी में गयापाल पंडा के अनुसार इस बार ज्यादातर श्रद्धालु नौ दिन, सात दिन, पांच दिन, तीन दिन या एक दिन का श्राद्ध करने पहुंचेंगे। दूसरी ओर, त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु 11 अक्टूबर तक गयाजी में रहकर पिंडदान पूरा करेंगे।
क्या होता है त्रैपाक्षिक श्राद्ध?
तीन पक्षों तक किए जाने वाले श्राद्ध को त्रैपाक्षिक श्राद्ध कहा जाता है। इसमें भाद्र शुक्ल पक्ष की अनंत चतुर्दशी, पूर्णिमा, आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या और आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तक श्राद्ध और पिंडदान का विधान होता है।
पितृपक्ष 2026 की प्रमुख श्राद्ध तिथियां
25 सितंबर, शुक्रवार- अनंत चतुर्दशी: पुनपुन में पिंडदान, गयापाल तीर्थ पुरोहित की पांव पूजा और गोदावरी श्राद्ध का विधान होगा।
26 सितंबर, शनिवार- पूर्णिमा: फल्गु नदी में स्नान, श्राद्ध और गयापाल पुरोहित की पांव पूजा की जाएगी।
27 सितंबर, रविवार- प्रतिपदा: ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, रामशिला, रामकुंड और काकबली में पिंडदान होगा।
28 सितंबर, सोमवार- द्वितीया: उत्तर मानस, उदीची, कनखल, दक्षिण मानस और जिह्वालोल श्राद्ध किया जाएगा।
29 सितंबर, मंगलवार- तृतीया: सरस्वती स्नान, पंचरत्न दान, मातंगवापी और धर्मारण्य में श्राद्ध होगा।
30 सितंबर, बुधवार- चतुर्थी: ब्रह्मसरोवर, काकबली और तारक ब्रह्म दर्शन का विधान है।
1 अक्टूबर, गुरुवार- पंचमी: रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद में पिंडदान किया जाएगा।
2 अक्टूबर, शुक्रवार- षष्ठी: कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद और गार्हपत्याग्निपद श्राद्ध होगा।
3 अक्टूबर, शनिवार- सप्तमी: सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद समेत विभिन्न वेदियों पर श्राद्ध किया जाएगा।
4 अक्टूबर, रविवार- अष्टमी और नवमी: सीताकुंड में बालू से पिंडदान, रामगया श्राद्ध, दूध तर्पण और अन्नदान का विधान होगा।
5 अक्टूबर, सोमवार- दशमी: गयासिर और गयाकूप में त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाएगा।
6 अक्टूबर, मंगलवार- एकादशी: मुण्डपृष्ठा, आदि गदाधर और धौतपद श्राद्ध होगा।
7 अक्टूबर, बुधवार- द्वादशी: भीमगया, गौ प्रचार और गदालोल श्राद्ध का विधान है।
8 अक्टूबर, गुरुवार- त्रयोदशी: भगवान विष्णु का पंचामृत स्नान और फल्गु नदी में दुग्ध तर्पण किया जाएगा।
9 अक्टूबर, शुक्रवार- चतुर्दशी: वैतरणी सरोवर पर गोदान और तर्पण होगा।
10 अक्टूबर, शनिवार- अमावस्या: अक्षयवट में श्राद्ध, खीर से पिंडदान और पितृ विसर्जन किया जाएगा।
11 अक्टूबर, रविवार- आश्विन शुक्ल प्रतिपदा: त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु गायत्री घाट पर दही-चावल से पिंडदान कर अपने पितरों को विदाई देंगे।
गयाजी में पिंडदान का क्यों है विशेष महत्व?
धार्मिक मान्यता के अनुसार गयाजी को पितृ तीर्थ कहा जाता है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि भगवान विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं। इसी आस्था के कारण हर साल पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने पहुंचते हैं।
मान्यता है कि गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। गयाजी के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण चिह्न भी मौजूद हैं, जिन्हें गयासुर की कथा से जोड़कर देखा जाता है। यही धार्मिक आस्था गयाजी को मोक्ष की नगरी के रूप में विशेष पहचान देती है।
पितृपक्ष के दौरान फल्गु नदी के तट, विष्णुपद मंदिर, अक्षयवट और अन्य प्रमुख वेदियों पर श्रद्धालुओं की गतिविधियां बढ़ जाती हैं। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों के साथ विदेशों से भी लोग अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक कर्मकांड करने गयाजी पहुंचते हैं।