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बिहार: बेटों को खोया, पोते पर भरोसा नहीं... 65 साल के सुखराम ने पत्नी संग गयाजी में किया अपना ही पिंडदान

Thu, 08 Oct 2026 08:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गयाजी

सार

गयाजी में पितृपक्ष के दौरान मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी 65 वर्षीय सुखराम केवट ने अपनी पत्नी चमारी बाई के साथ जनार्दन मंदिर में अपना और पत्नी का आत्म पिंडदान किया। सुखराम ने बताया कि उनके दोनों बेटों की मौत हो चुकी है और उन्हें चिंता थी कि भविष्य में उनका पोता उनके लिए गयाजी आकर पिंडदान करेगा या नहीं।
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सुखराम केवट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गयाजी में पितरों की मुक्ति के लिए लाखों श्रद्धालु पिंडदान कर रहे हैं। इसी बीच पितृपक्ष मेले में बुधवार को सामने आया एक मामला लोगों को भावुक कर गया। मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी 65 वर्षीय सुखराम केवट अपनी पत्नी चमारी बाई के साथ गयाजी पहुंचे और पूर्वजों के बजाय अपना और पत्नी का ही पिंडदान कर दिया।

सुखराम ने बताया कि उनके दोनों बेटे अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्हें भरोसा नहीं है कि भविष्य में उनका पोता उनके लिए गयाजी आकर पिंडदान करेगा। इसी चिंता के चलते उन्होंने स्वस्थ रहते हुए ही अपने मोक्ष की व्यवस्था करने का फैसला किया।

जनार्दन मंदिर में विधि-विधान से किया आत्म पिंडदान

सुखराम केवट पत्नी के साथ मां मंगलागौरी मंदिर परिसर की पहाड़ी पर स्थित प्राचीन जनार्दन मंदिर पहुंचे। यहां उन्होंने विधि-विधान से तीन पिंड अर्पित किए। इन पिंडों को उन्होंने अपने और अपनी पत्नी के लिए अग्रिम रूप से भगवान जनार्दन को समर्पित किया। पिंडदान के दौरान सुखराम ने भगवान से प्रार्थना की कि मृत्यु के बाद इन पिंडों को स्वीकार कर उन्हें और उनकी पत्नी को मोक्ष प्रदान करें। पितृपक्ष के दौरान रोजाना होने वाले हजारों कर्मकांडों के बीच आत्म पिंडदान का यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए अलग और भावुक कर देने वाला रहा।

दोनों बेटों की मौत के बाद सताने लगी भविष्य की चिंता

सुखराम ने बताया कि उनके दो बेटे थे। एक बेटे की बचपन में ही मौत हो गई, जबकि दूसरे बेटे की शादी के बाद मृत्यु हो गई। उनके बड़े बेटे टुकेश्वर केवट का एक पुत्र है। सुखराम के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ उन्हें यह चिंता सताने लगी कि उनके निधन के बाद उनका पोता गयाजी आएगा या नहीं और उनके लिए पिंडदान करेगा या नहीं। इसी चिंता के चलते उन्होंने खुद ही पिंडदान करने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि जब तक शरीर और स्वास्थ्य साथ दे रहे हैं, तब तक गयाजी आकर अपना पिंडदान कर देना बेहतर है। इसी सोच के साथ वह अपनी पत्नी के साथ मंगलवार को गयाजी पहुंचे और बुधवार को आत्म पिंडदान की प्रक्रिया पूरी की।

गरुड़ पुराण और भागवत पढ़कर मिली आत्म पिंडदान की जानकारी

जबलपुर निवासी सुखराम सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हैं और पत्नी के साथ रहते हैं। धार्मिक प्रवृत्ति के सुखराम ने बताया कि उन्होंने गरुड़ पुराण और भागवत महापुराण का अध्ययन किया है। धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते समय उन्हें आत्म पिंडदान की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने पितृपक्ष के दौरान गयाजी आने का फैसला किया। मंगलवार को गयाजी पहुंचने के बाद बुधवार को उन्होंने पत्नी के साथ जनार्दन मंदिर में यह कर्मकांड पूरा किया।

शास्त्रों में आत्म पिंडदान का उल्लेख

सुखराम का पिंडदान कराने वाले आचार्य विकास पांडेय ने बताया कि शास्त्रों में स्वयं के लिए पिंडदान यानी आत्म पिंडदान का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, आश्विन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को इस तरह का कर्मकांड करना विशेष महत्व रखता है। आचार्य ने बताया कि इसी धार्मिक मान्यता के तहत सुखराम केवट ने अपनी पत्नी के साथ स्वयं के लिए पिंडदान किया।

पिता के दर्द और अकेलेपन की कहानी

गयाजी में पितृपक्ष के दौरान हर दिन हजारों लोग अपने माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। लेकिन सुखराम की कहानी केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। इसमें एक पिता का दर्द, अकेलापन और भविष्य को लेकर चिंता भी दिखाई देती है। जिन बेटों से माता-पिता को अंतिम संस्कार और श्राद्ध की उम्मीद होती है, सुखराम अपने दोनों बेटों को खो चुके हैं। ऐसे में उन्होंने अपनी जिंदगी में ही वह रस्म पूरी कर दी, जो आमतौर पर संतान अपने माता-पिता के लिए करती है। गयाजी के पितृपक्ष मेले में उनका आत्म पिंडदान श्रद्धा के साथ-साथ एक पिता की उस पीड़ा को भी सामने लाया, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है।

 

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