बिहार के समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर प्रखंड स्थित हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान अपनी अनूठी धार्मिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां मां दुर्गा के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को सप्तमी या अष्टमी तक इंतजार नहीं करना पड़ता, बल्कि शारदीय नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही मंदिर के पट खोल दिए जाते हैं। इसके बाद पूरे नौ दिनों तक पूजा-अर्चना, आरती और दर्शन का सिलसिला चलता है। करीब 200 साल पुरानी बताई जाने वाली इस परंपरा की शुरुआत गांव और समाज को महामारी से बचाने की कामना के साथ हुई थी। आज भी स्थानीय लोग पूर्वजों की इस धार्मिक विरासत को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। मंदिर की एक और खासियत यह है कि यहां मां दुर्गा के साथ करीब 20 अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की भी पूजा की जाती है। नवरात्र शुरू होते ही मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है और वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ व संध्या आरती से पूरा परिसर भक्तिमय हो उठता है।
कलश स्थापना के साथ ही खुल जाते हैं मां के पट
शारदीय नवरात्र में कलश स्थापना को शक्ति की उपासना की शुरुआत माना जाता है। हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान में इसी दिन मां दुर्गा के पट खोलने की परंपरा है। जहां कई पूजा स्थलों पर श्रद्धालुओं को प्रतिमा के दर्शन के लिए सप्तमी या अष्टमी तक इंतजार करना पड़ता है, वहीं इस मंदिर में नवरात्र के पहले दिन से ही दर्शन शुरू हो जाते हैं।
महामारी से गांव की रक्षा के संकल्प के साथ शुरू हुई थी पूजा
हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान की स्थापना के पीछे स्थानीय लोगों की आस्था और पूर्वजों की मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। बताया जाता है कि करीब 200 साल पहले गांव के रघुवंश नारायण सिंह और कुलदीप नारायण सिंह के पूर्वजों ने महामारी से गांव और समाज की रक्षा की कामना के साथ मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा की शुरुआत की थी। उनके वंशज विभूति कुमार सिंह, मुखिया प्रेमशंकर सिंह, प्रो. सुशील कुमार सिंह और विपुल कुमार सिंह के अनुसार, पूर्वजों द्वारा शुरू की गई पूजा परंपरा को बाद की पीढ़ियों ने भी पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाया। समय के साथ धार्मिक आयोजनों के स्वरूप में बदलाव आया, लेकिन नवरात्र के पहले दिन मां के पट खोलने की परंपरा आज भी कायम है। पूजा की तैयारियों से लेकर आयोजन की व्यवस्था तक ग्रामीणों की भागीदारी रहती है। यही वजह है कि यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक विरासत और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक भी बन गया है।
मां दुर्गा के साथ करीब 20 अन्य देवी-देवताओं की होती है पूजा
हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान की एक विशेषता यहां स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं। मंदिर में मां दुर्गा के साथ करीब 20 अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की भी पूजा की जाती है। नवरात्र के दौरान श्रद्धालु इन सभी प्रतिमाओं के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, धार्मिक अनुष्ठान और आरती के बीच मंदिर परिसर में भक्ति का माहौल बना रहता है। नवरात्र के नौ दिन शक्ति की आराधना के लिए विशेष माने जाते हैं। ऐसे में पहले दिन से शुरू होने वाला दर्शन-पूजन श्रद्धालुओं को पूरे नवरात्र मां के दरबार में पहुंचने का अवसर देता है। स्थानीय लोगों के लिए यह परंपरा धार्मिक विश्वास के साथ-साथ गांव की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ी हुई है।
संध्या आरती में उमड़ती है श्रद्धालुओं की आस्था
नवरात्र के दौरान मंदिर में संध्या आरती का विशेष महत्व रहता है। दिनभर की पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु दीप जलाकर और आरती के साथ मां की स्तुति करते हैं। इस दौरान परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मंगल की कामना की जाती है। मां के प्रति गहरी आस्था श्रद्धालुओं को मंदिर तक खींच लाती है। नवरात्र के नौ दिनों में मंदिर का वातावरण पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों और भक्ति के रंग में रंगा रहता है।
महानवमी पर बलि और खोइंछा भरने की परंपरा
हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान में महानवमी के दिन भी विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार, मनोकामना पूरी होने पर कुछ श्रद्धालु नवमी के दिन छागर यानी बकरे की बलि अर्पित करते हैं। वहीं, महिला श्रद्धालु मां का खोइंछा भरने के लिए मंदिर पहुंचती हैं। इन परंपराओं के माध्यम से श्रद्धालु अपनी आस्था व्यक्त करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा मंगल की कामना करते हैं। महानवमी के दिन मंदिर में धार्मिक गतिविधियां विशेष रूप से देखने को मिलती हैं।
दशमी पर कंधे पर उठाकर गंगा नदी में किया जाता है प्रतिमा विसर्जन
दशमी के दिन मंदिर की पूजा परंपरा का एक और महत्वपूर्ण चरण पूरा होता है। इस दिन मां दुर्गा की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर गंगा नदी तक ले जाया जाता है, जहां विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है। प्रतिमा विसर्जन की इस परंपरा में धार्मिक श्रद्धा के साथ सामूहिक सहभागिता भी दिखाई देती है। ग्रामीण मिलकर इस आयोजन में भाग लेते हैं और मां को विदाई देते हैं। इस तरह नवरात्र के पहले दिन से शुरू होने वाला पूजा-अर्चना का सिलसिला दशमी पर प्रतिमा विसर्जन के साथ संपन्न होता है।
मिथिलांचल की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है मंदिर
मिथिलांचल में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही पूजा-पद्धतियां स्थानीय परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामुदायिक एकजुटता को जीवित रखती हैं। हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान इसका उदाहरण है। करीब 200 साल से चली आ रही पूजा परंपरा, नवरात्र के पहले दिन से मां के दर्शन और दशमी को गंगा नदी में प्रतिमा विसर्जन की परिपाटी इस मंदिर को विशिष्ट पहचान देती है। यहां की विशेषता केवल प्रतिमाओं और धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन मान्यताओं में भी है जिन्हें स्थानीय परिवारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहेजकर रखा है। नवरात्र के पहले दिन ही खुलने वाला मां का पट इसी विरासत की जीवंत कड़ी है। यही वजह है कि हरपुर बोचहा दुर्गा स्थान में आस्था और परंपरा का यह सिलसिला आज भी पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रहा है।