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मिथिलांचल का शक्तिपीठ: मां दुर्गा का अनोखा दरबार! जहां सिंहासन में विराजती हैं भगवती, नेपाल से भी आते हैं भक्त

Sun, 11 Oct 2026 09:01 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा

सार

दरभंगा के बेनीपुर स्थित सिद्धपीठ मां हैयहठ्ठ देवी मंदिर में शारदीय नवरात्र पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इस ऐतिहासिक मंदिर की खास परंपरा है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा के बजाय उनके पवित्र सिंहासन की पूजा की जाती है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
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सिद्धपीठ मां हैयहठ्ठ देवी - फोटो : अमर उजाला
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दरभंगा जिले के बेनीपुर के अनुमंडल मुख्यालय से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित सिद्धपीठ मां हैयहठ्ठ देवी दरबार में शारदीय नवरात्र के कलश स्थापना के साथ ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने लगी है। इस ऐतिहासिक मंदिर की अपनी एक अनोखी परंपरा है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा के बजाय उनके पवित्र सिंहासन की पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार मां भगवती इस सिंहासन में ही साक्षात विराजमान रहती हैं।
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मिथिलांचल के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त मां के दर्शन और आशीर्वाद पाने के लिए यहां पहुंचते हैं। माना जाता है कि नवरात्र के दौरान सच्चे मन से सिंहासन का पूजन करने वाले श्रद्धालुओं को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

सिद्धपीठ की समृद्ध परंपरा
मिथिलांचल क्षेत्र में प्राचीन काल से ही मूर्ति पूजा की समृद्ध परंपरा रही है, लेकिन नवादा गांव स्थित यह सिद्धपीठ इस मामले में पूरी तरह अलग है। मंदिर में स्थापित मां के सिंहासन की पूजा को लेकर क्षेत्र में कई पौराणिक और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ श्रद्धालुओं का मानना है कि इस पवित्र स्थान पर शिवप्रिया सती का वाम स्कंध गिरा था।
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मंदिर में स्थापित सिंहासन का आकार भी कान के समान दिखाई देता है। स्थानीय ग्रामीण डॉ चंद्रमणि झा के अनुसार, नवादा स्थित यह दुर्गा स्थान 52 सिद्धपीठों में से एक माना जाता है। इस पावन स्थल का स्पष्ट उल्लेख देवी भागवत पुराण तथा मत्स्य पुराण में भी मिलता है।

राजा हैयहट्ट और साधक से जुड़ी कथा
स्थानीय निवासियों के अनुसार, सैकड़ों वर्ष पहले राजा हैयहट्ट ने इस स्थल पर मां जगदंबा की प्रतिमा स्थापित कराई थी। उस समय बहेड़ी प्रखंड के हावीभौआर गांव के एक साधक प्रतिदिन कमला नदी पार कर नवादा में मां भगवती की पूजा करने आया करते थे। वृद्धावस्था में अस्वस्थ होने के कारण जब साधक के लिए नियमित रूप से मंदिर आना कठिन हो गया, तो उन्होंने मां से कोई उपाय करने की प्रार्थना की। कहा जाता है कि इसके बाद मां भगवती ने साधक को स्वप्न में अपनी प्रतिमा लेकर गांव जाने का निर्देश दिया। साधक प्रतिमा लेकर हावीभौआर चले गए और वहां उसे स्थापित कर दिया। आज भी हावीभौआर में भगवती का मंदिर स्थित है।

सिंहासन पूजन का दिव्य निर्देश
नवादा के ग्रामीणों को जब प्रतिमा को हावीभौआर ले जाने की जानकारी मिली, तो उन्होंने उसे वापस लाने का निर्णय लिया। इसी दौरान मां भगवती ने मंदिर के पुजारी को स्वप्न में दर्शन दिए और ग्रामीणों को सिंहासन की ही पूजा करने का निर्देश दिया। मां ने कहा कि इसी से गांव का कल्याण होगा और सभी श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होंगी। तभी से यहां सिंहासन की पूजा-अर्चना की परंपरा अनवरत जारी है। मंदिर के पुजारी अमरनाथ ठाकुर बताते हैं कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से मां भगवती की आराधना करते हैं, उन्हें मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

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मंदिर में श्रद्धालुओं का नियमित तांता
सिद्धपीठ में पूरे साल भर श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। खासकर प्रत्येक रविवार और मंगलवार को यहां मेले जैसा विहंगम नजारा रहता है। वर्ष के चारों नवरात्र में मां भगवती की विशेष पूजा आयोजित की जाती है, लेकिन शारदीय नवरात्र का विशेष महत्व माना जाता है। मंदिर में ब्राह्मणों और कुमारी कन्याओं को सम्मानपूर्वक भोजन कराने तथा बलि प्रदान करने की परंपरा भी सदियों से निरंतर चली आ रही है।
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