बिहार की राजधानी पटना के उत्तर में श्रीपालपुर गाँव के लोग पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को मुख्य मंत्री पद से हटा दिए जाने के कारण दुखी हैं और उनमें रोष है।
सुमंत रविदास नाराजगी भरे लहजे में कहते हैं, "जीतन मांझी को सीएम नीतीश कुमार ने बनवाया, लेकिन उनको हटवाया काहे? बार-बार बेइज्जत काहे करवाए? जब हटाने था त सीएम काहे बनाए?" जवाब भी खुद ही देते हैं और कहते हैं, "हरिजनवा के पंखा-बिजली माफ करना उनको खराब लगा का?" वे 'मांझी जिंदाबाद' कहते हैं और चले जाते हैं।
जेडीयू का तीर
परशुराम राम कहते हैं, "उनके कार्यकाल के दौरान निचले तबके को सुविधा मिली। सरकार त ठीके चला रहे थे, फैसला भी व्यावहारिके था। लेकिन, बरबस हटा दिए।"
इन लोगों से बातचीत करने से लगता है कि मांझी भले ही सत्ता से बेदखल कर दिए गए हों, लेकिन दलितों-महादलितों और गरीबों में उन्हें पसंद करने वाले लोग मौजूद हैं। लेकिन सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह इस बात से सहमत नहीं लगे। उनके अनुसार, जीतन राम मांझी को लेकर एक भ्रम था।
बिहार की राजनीति
वशिष्ठ नारायण सिंह बताते हैं कि मांझी के एक दर्जन सिपहसलार ऐसे हैं, जिन्होंने विश्वासमत के दौरान अपनी सदस्यता बचाने के लिए पार्टी लाइन पर वोट किया। दलितों के लगभग 16 प्रतिशत एकमुश्त वोट पर जेडीयू की नज़र को ध्यान में रखकर उन्हें नीतीश कुमार का उत्तराधिकारी बनाया गया था।
शोध संस्थान एशियन डेवेलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदस्य-सचिव प्रोफेसर शैबाल गुप्ता कहते हैं, "मांझी के चलते बिहार की राजनीति मे दलित मुद्दा आगे नहीं आया। बल्कि मुख्यमंत्री नीतीश के द्वारा महादलित एजेंडे को सशक्त ढंग से रखने का परिणाम जीतन राम मांझी हैं।"
नए सहयोगी
अब शासन तंत्र के बिना वे दलित एजेंडा को आगे रखने में कितना सफल होंगे यह देखना होगा। सत्तारूढ़ जेडीयू को आगामी चुनाव में इससे नुकसान होने की संभावना है। महादलितों की नाराजगी को ध्यान में रखते हुए ही शायद जेडीयू के नए सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता भी उनकी घर वापसी की बात बार-बार कह रहे हैं।
पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी के अनुसार, जीतन राम मांझी की छवि उत्तर भारत के एक स्वाभिमानी दलित नेता के रूप में उभरी है। इनकी लोकप्रियता का ख़ामियाजा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आगामी विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।
बिहार की राजनीति में भरेंगे नए रंग
पूर्व मुख्यमंत्री मांझी ने बिहार के दलितों को नया राजनीतिक तेवर देने के लिए 28 फरवरी को हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) का गठन कर अपने इरादे साफ कर दिए हैं।
उनका मोर्चा कब पार्टी में तब्दील होगा और किसके साथ गठबंधन करेगा, यह अभी तय नहीं है। लेकिन इतना तय है कि अगले विधान सभा चुनाव में महादलित बिहार की राजनीति में नए रंग जरूर भरेंगे।