फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Bihar Election 2020: बूथ कैप्चरिंग से ईवीएम तक, कितना बदला बिहार?

Fri, 06 Nov 2020 07:51 PM IST
कुमार संभव कुमार सम्भव जैन, न्यूज डेस्क, नई दिल्ली
विज्ञापन
बिहार चुनाव 2020 - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
एक दौर था जब बम, गोली और गुंडागर्दी के बिना यहां चुनाव की कल्पना ही नहीं होती थी। बूथ कैप्चरिंग आम बात थी और लोगों के पास तो अपना ही वोट डालने का 'अधिकार' तक नहीं था। और मतदान के बीच फायरिंग होना लोगों ने चुनाव का हिस्सा मान लिया था। सही पहचाना बात बिहार की ही हो रही है, जहां एक बार फिर विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। इस बार ईवीएम से सरकार चुनने में जुटा बिहार उन किस्सों और डरावनी यादों से अब तक बाहर आ चुका है। कैसे बदला बिहार? बूथ कैप्चरिंग से ईवीएम तक का सफर बिहार के लोगों ने कैसे तय किया? आइए रूबरू होते हैं बिहार के करीब 60 साल के इस सफर से...
विज्ञापन


1957 में पहली बार हुई थी बूथ कैप्चरिंग
बूथ कैप्चरिंग क्या होती है? इससे न तो गुलाम हिंदुस्तान कभी रूबरू हुआ था और न ही इसका भान आजाद भारत को था। बात साल 1957 की है। आजादी मिलने के 10 साल बाद देश में दूसरे आम चुनाव हो रहे थे और उसी दौरान भारतीय लोकतंत्र पहली बार बूथ कैप्चरिंग जैसी समस्या से दो-चार हुआ। यह घटना बिहार के बेगूसराय जिले की मटिहानी विधानसभा सीट के रचियाही इलाके में हुई थी। यहां के स्थानीय लोगों ने सरयू प्रसाद सिंह के लिए कछारी टोला बूथ पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद अगले तमाम चुनावों तक बूथ कैप्चरिंग आम हो गई, खासतौर पर बिहार में। यहां राजनीतिक पार्टियां इसके लिए माफिया तक का सहारा लेने लगीं।

बिहार चुनाव: किसका होगा तीसरा चरण, किसका खेल बिगाड़ेंगे मुस्लिम, यादव और ब्राह्मण वोट बैंक?
विज्ञापन


डॉन तक का सहारा लेने लगे थे राजनीतिक दल
पुराने लोग बताते हैं कि उस दौर में बूथ कैप्चरिंग का काम बेगूसराय के डॉन कामदेव सिंह ने पकड़ लिया। वह इतना दबंग था कि नेता बूथ कैप्चरिंग के लिए उसकी मदद लेने लगे। स्थानीय लोग बताते हैं कि 1972 के चुनाव में मिथिला क्षेत्र से आने वाले एक केंद्रीय मंत्री ने चुनाव जीतने के लिए कामदेव सिंह का सहारा लिया था।

बेहद खराब थी बिहार की छवि
बिहार में चुनाव के दौरान अपराध, हिंसा और लूट का बोलबाला शुरू हुआ, उससे राज्य की छवि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब होती चली गई। उस वक्त बिहार का चुनाव एक तरह से 'गन, गोली और गून्स' का पर्याय बन गया। 1970 के दशक में बूथ कैप्चरिंग एक आम शब्द बन गया और बिहार से शुरू हुआ बूथ कैप्चरिंग का यह सिलसिला उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल होते हुए अन्य राज्यों तक पहुंच गया।

Bihar Election 2020: JDU यह मेरा आखिरी चुनाव है, नीतीश का आखिरी चुनाव या आखिरी दांव?
विज्ञापन


1991 में चली बदलाव की बयार
कहते हैं कि वक्त कभी न कभी बदलता जरूर है और बिहार में भी कुछ ऐसा हुआ। और इसकी शुरुआत हुई साल 1991 में। दरअसल, 1990 में टीएन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला। उन्होंने बिहार में शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और निर्भय वातावरण में चुनाव कराने को चुनौती की तरह लिया। आपको बता दें कि 1991 में लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ। मतदान के दिन बड़े पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग हुई। ऐसे में टीएन शेषन ने पटना लोकसभा का चुनाव ही रद्द कर दिया। उस दौरान टीएन शेषन को थोड़ी सफलता मिली और 1995 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने मुकाम हासिल कर लिया। दरअसल, उनकी जिद थी कि हर बूथ पर मतदान तभी होगा, जब वहां अर्द्धसैनिक बल तैनात होगा। इसके चलते बिहार में चार बार वोटिंग टली। करीब एक सप्ताह तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा। आखिरकार, टीएन शेषन की जीत हुई और बिहार में पहली बार भयमुक्त मतदान हुआ।

बिहार चुनाव: कहानी उस सीएम की, जो नहीं मांगते थे वोट

ईवीएम से बदल गए हालात?
भारतीय लोकतंत्र में कड़ी मशक्कत के बाद ईवीएम की एंट्री हुई और साल 2000 के बाद देश के सभी लोकसभा, विधानसभा और उपचुनावों में ईवीएम का इस्तेमाल होने लगा। ऐसे में सवाल उठता है कि ईवीएम की एंट्री के बाद बिहार का चुनावी माहौल कैसा है? दरअसल, ईवीएम आने से बूथ कैप्चरिंग जैसी समस्या तो दूर हो गई, लेकिन चुनाव के दौरान दबंगई से बिहार को अब भी पूरी तरह निजात नहीं मिली है। बिहार में दूसरे चरण के मतदान के दौरान छपरा में ईवीएम तोड़े जाने की घटना इसका महज एक उदाहरण ही कहा जा सकता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें