राजनीति का दूसरा नाम मौका परस्ती है। यानी राजनीति के घाघ मौके की तलाश में रहते हैं जैसे ही अवसर मिला दांव चला और सियासत पूरी तरह बदल कर रख देते हैं। सियासत का रंग रूप चंद मिनटों में बदल देना इसी सियासत की देन है।
राजनीति के बड़े-बड़े दिग्गज इस मौका परस्ती में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीति का स्वरूप थोड़ा और बदला है। पहले बड़े नेता सिद्धांत का हवाला देकर अपनी इच्छाओं को दबा कर चुपचाप अपनी पार्टी के वफादार बने रहने की कोशिश में लगे रहते थे लेकिन अब सूबे की मांग और जनता को दिए कमिटमेंट के नाम पर बड़े- बड़े दिग्गज भी आया राम गया राम की राजनीति में शामिल हो गए हैं।
लेकिन इनका स्टाइल थोड़ा हटकर होता है। ये बड़े खुद कहीं आते जाते नहीं हैं बल्कि इशारे इशारे में पूरी सियासत को ही बदल देते हैं और कुर्सी पर अपना कब्जा जमाए रखते हैं।
हरियाणा की देन है आया राम गया राम
अब बिहार की राजनीति को ही देखिए पलभर में पूरी सियासत बदल गई। 26 जुलाई की दोपहर तक नीतीश महागठबंधन के नेता थे और बिहार के मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री तो वो आज भी हैं महज 15 घंटे की हलचल के बाद वो एनडीए में शामिल हो गए हैं।
वैसे नीतीश के गुरू रहे हैं जॉर्ज फर्नांडीज। 1979 में जॉर्ज फर्नांडीज ने भी महज चार घंटे में केंद्र सरकार हिलाकर रख दी था। एक तरफ वे लोकसभा में मोरारजी भाई की सरकार के विश्वासमत के समर्थन में भाषण देकर सदन को यह बताते रहे कि क्यों मोररजी भाई की सरकार होनी चाहिए... लेकिन जैसे ही लोकसभा से निकले जॉर्ज ने मोरारजी का खेमा छोड़ दिया और चौधरी चरण सिंह के समर्थन में उतर आए। जार्ज के ही अनुयायी दिख रहे हैं नीतीश। तीन घंटे में ही सरकार बदल ली है।
आया राम गया राम की राजनीति हरियाणा की देन है। जब हसनपुर के एमएलए गया लाल ने एक ही दिन में तीन पार्टियां बदल कर कीर्तिमान स्थापित किया और राजनीति को आया राम गया राम की नई राह दिखाई।
बात 1967 की है। गया लाल हरियाणा जनहित कांग्रेस के विधायक थे। उन्हें राजनीति की गहरी समझ थी और इसी समझ का फायदा उन्होंने उठाया और एक ही दिन में हर घंटे पार्टी बदली और 'आया राम गया राम' कहावत को स्थापित किया।
ऐसा ही एक मामला भजन लाल वर्सेज देवी लाल का भी याद आ रहा है। उस समय हरियाणा के राज्यपाल जीडी तपासे ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए संदेश भेजा था। तपासे ने भजन लाल को अपना बहुमत साबित करने के लिए एक महीने का समय दिया था।
उस समय देवी लाल और अपने 48 विधायक के साथ समर्थक लोकदल और बीजेपी के विधायकों के साथ राज्यपाल को सरकार बनाने के लिए प्रस्ताव भेजने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन तभी मुख्यमंत्री बनने के लिए भजनलाल ने तिकड़म खेला और अपने 37 विधायकों के साथ जनता पार्टी को छोड़ कांग्रेस को ज्वाइन किया और 1980 में हरियाणा के मुख्यमंत्री बन गए।
अरुणाचल प्रदेश में पिछले दिनों राजनीतिक उठापटक का दिलचस्प नजारा देखने को मिला था। प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू सहित पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश के 33 विधायकों ने पलक झपकते ही भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। अब वहां पर भाजपा की सरकार है। अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में 60 सीटें हैं।
मध्य प्रदेश में उमा दीदी की सरकार तो याद ही होगी। उन पर राजनीतिक आरोप लगे उन्होंने बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। चीजें क्या और कैसे बदली किसी से छुपी नहीं है। जयललिता ने अपने रहते हुए पन्नीरसेल्वम को अपना उत्तराधिकारी चुना था। जब उनकी मौत के बाद उनकी खुद की पार्टी दो खेमों में बट गई और रातों रात शशिकला और पन्नीरसेल्वम में बंटी नजर आई। इस सब सियासी उठापटक का फायदा पलानीसामी को मिला।