दूसरी जाति बताना सरकार का घोर अपराध है
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उपजाति और टाइटल को जाति बताने पर सवाल
बिहार में कायस्थ जाति फॉरवर्ड में तो है ही, शहरी लोकसभा-विधानसभा सीटों पर इनका प्रभाव भी दिखता है। चाणक्या इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के निदेशक सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं कि "कलम-दावात की पूजा करने वाले कायस्थ जाति का बिहार के निर्माण में बड़ा योगदान रहा है। कायस्थों में 12 उप-जातियां हैं। 'श्रीवास्तव' कायस्थों की एक उप-जाति है। उत्तर प्रदेश और इससे सटे बिहार में इस उप-जाति के कायस्थ सबसे ज्यादा संख्या में हैं। इसके अलावा कायस्थों को 'लाला' भी कहा जाता है। लाला का अर्थ हिसाब-किताब संभालने वाले के रूप में लगाया जाता है। कहीं-कहीं कायस्थों के लिए यह प्रमुख टाइटल भी है। इसी तरह 'लाल' भी टाइटल है।"
खुली साजिश है यह, सरकार ही खेल कर रही है
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सोशल मीडिया पर ट्रोल हो रही सरकार
जातिगत जनगणना के लिए 214 जातियों का कोड जारी किया गया है। इन जातियों का कोड जारी किए जाने के बाद से सोशल मीडिया पर यह चर्चा का विषय है। जातियों के लिए कोड निर्धारित किए जाने में ऐसी ही गड़बड़ी को लेकर लोग सरकार को ट्रोल भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया यूजर्स तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं कि सरकार हिंदू रीत-रिवाज और परंपरा से उलट नई-नई भ्रांतियां फैला रही है। लोग इसे साजिश बताकर पोस्ट भी शेयर कर रहे हैं।
कायस्थ जाति के साथ मजाक कर रही सरकार
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जाति जनगणना पर सवाल उठाता रहा है यह वर्ग
बिहार में जातिगत जनगणना की बात जब से उठी, तभी से इस जाति के लोग विराेध कर रहे हैं। पढ़ने-लिखने की उम्र में इसे जातिगत दलदल में धकेलने की बात कहकर विरोध जताया जाता रहा। अब सरकार की ओर विकल्पहीन होने के बाद जब जाति जनगणना शुरू हो रही है तो मशहूर साहित्यकार शिवदयाल कहते हैं कि "आजादी के 75 साल बाद बिहार को करीब 90 साल पीछे धकेलने की कोशिश होनी ही नहीं चाहिए थी। नीति-निर्धारक ही ऐसा कर रहे हैं तो जनता मानने के लिए मजबूर है। और, जब ऐसा कर रहे हों तो आननफानन में कुछ भी नहीं कर देना चाहिए। जातिवार गिनना है तो उपनामों का इस तरह उपयोग कर भ्रांति नहीं फैलानी चाहिए।"