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असदुद्दीन ओवैसी: किंग, किंगमेकर या वोटकटवा?

Mon, 12 Oct 2015 09:25 AM IST
राहुल सांकृत्यायन/ अमर उजाला, दिल्ली
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असदुद्दीन ओवैसी। भारतीय राजनीति का वो नाम जिसे बीते कुछ समय पहले तक कोई नहीं जानता था लेकिन आज ऐसा वक्त है कि राजनीति के हर मोर्चे पर वो और उनकी पार्टी चर्चा का विषय है।
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ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तदाहुल मुस्लिमीन के मुखिया है और हैदराबाद से मौजूदा सांसद। 1994 में जब ओवैसी पहली बार आंध्र विधानसभा के सदस्य चुने गए तो उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

1999 में वो दुबारा उसी सीट से विधायक चुने गए। विदेश से कानून की पढ़ाई कर के आए ओवैसी ने देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद में पहली बार 2004 में कदम रखा और तब से लेकर अब तक लगातार 3 बार से आंध्र की हैदराबाद सीट से सांसद चुने जा रहे हैं।
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सांसद रत्न ओवैसी

ये बात शायद बहुत कम लोगों को मालूम हो कि 2014 की 15 वीं लोकसभा में उन्हें सांसद रत्न के पुरस्कार नवाजा गया था। ओवैसी और विवादों का चोली दामन का साथ है।

वो पहली बार विवादों में तब आए थे जब 16 अप्रैल 2005 को उनकी पार्टी ने आंध्र के मेंडक जिले में एक सड़क बनने के दौरान मस्जिद गिराने के विरोध में प्रदर्शन किया था।

जिसके बाद पुलिस ने उन्हें विभिन्न धाराओं के अंतर्गत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। इस दौरान उन पर दंगा फैलाने, दो संप्रदायों के बीच वैमनस्यता फैलाने और आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे।

तब बने चर्चा का हिस्सा

2009 में के आम चुनावों में ओवैसी पर सैयद सलीमुद्दीन नाम के पोलिंग एजेंट को पीटने के आरोप में चुनाव आयोग ने केस दर्ज कराया था।

ओवैसी दोबारा 2012 में भड़की असम हिंसा के दौरान फिर चर्चा का केंद्र बने थे जब उन्होंने कहा था कि हिंसा में पीड़ित मुस्लिमों को अगर सही तरह से उनकी मदद नहीं की गई मुस्लिम युवक भड़क कर कोई गलत रास्ता अपना सकते हैं और इससे मुस्लिमों के भीतर भारी विद्वेष की भावना जन्म लेगी।

जनवरी 2013 में ओवैसी को 2005 के उस मामले में 14 दिन की न्यायिक हिरासत में लिया गया जिसमें उन पर दंगे फैलाने के आरोप लगे थे।

हिन्दू कट्टरपंथ के हैं खिलाफ

ओवैसी अपनी मुस्लिम केंद्रीय राजनीति की वजह से आए दिन विवादों का हिस्सा बने रहते हैं। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद ओवैसी विभिन्न राजनैतिक दलों के बीत चर्चा का विषय बन गए थे जब उन्होंने जून 2014 में पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ भड़काउ भाषण दिया था।

ओवैसी जहां एक ओर मुस्लिम आधारित राजनीति करते नजर आते हैं वहीं दूसरी ओर उन्हें जकीउर्ररहमान लखवी और हाफिज सईद जैसे आतंकियों से घृणा भी है।

ओवैसी का कहना है कि देश का दुश्मन, मुस्लिमों का दुश्मन भी है इसलिए वो आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी करते रहे हैं। ओवैसी खुद को हिन्दू कट्टरपंथ के खिलाफ मानते हैं न कि हिन्दुओं के।

भाजपा के एजेंट!

अगर मौजूदा हालात की बात करें तो ओवैसी देश की राजनीति में खासा मायने रखते हैं। बिहार चुनाव में अपनी ताल ठोंक कर उन्होंने इस बात को साबित भी कर दिया।

ओवैसी के बारे में कहा जाता है कि मुल्क में जहां भी चुनाव होता है, वो वहां सत्ता बनाने के लिए नहीं, बल्कि सत्ता के प्रमुख दावेदारों का खेल खराब करने के लिए अपना प्रत्याशी मैदान में उतारते हैं।

बिहार चुनाव में जब ओवैसी ने सीमांचल में चुनाव लड़ने की बात कही तो यह खुल कर कहा जाने लगा कि वे भारतीय जनता पार्टी के एजेंट के रूप में यहां आए हैं।
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अब परिणाम बताएगा!

बीते साल महाराष्ट्र के चुनाव में जब ओवैसी ने अपने प्रत्याशी को उतारने का ऐलान किया था, तब कांग्रेस और एनसीपी गठबंधन का माथा ठनक गया था। कांग्रेस की ओर से तो यह भी कह दिया गया था कि ओवैसी को भाजपा मतदाताओं के वोट काटने के लिए ला रही है।

यही बात बड़े जोर शोर से बिहार चुनावों के संदर्भ में महागठबंधन मुस्लिम मतदाताओं के बीच दोहरा रहा है कि वो केवल वोट काटने के लिए भाजपा की ओर से डमी खड़े किए गए हैं।

अब इस बात का परिणाम तो बिहार चुनाव ही तय करेंगे कि ओवैसी किंग है, किंगमेकर हैं या फिर वोट काटने वाले वोटकटवा?
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