राज्य की आबादी 2051 तक 20 करोड़ तक हो जायेगी। एक शोधपत्र में प्रकाशित इस आकलन के अनुसार कुल प्रजनन दर को 2.1 माना जाये तो 2051 में राज्य की आबादी अधिकतम 20 करोड़ और न्यूनतम 16 करोड़ तक पहुंच जायेगी।
यह आकलन अनुग्रह नारायण सिंह सामाजिक अध्ययन संस्थान के निदेशक डीएम दिवाकर के ताजा शोधपत्र का है। यह शोधपत्र संस्थान की पत्रिका जर्नल ऑफ सोशल एंड इकोनॉमिक स्टडीज के विशेष अंक पॉपुलेशन एंड डेवलपमेंट इन बिहार में प्रकाशित किया गया है।
शोधपत्र के अनुसार बिहार की आबादी तीस साल में दोगुनी हो गई है। 1901 में 2.15 करोड़ थी, जो 1971 में बढ़ कर 4.21 करोड़ (लगभग दोगुनी) हो गयी। इसके बाद 30 साल में ही आबादी दोगुनी हो गयी। 2001 में राज्य की आबादी 8.3 करोड़ को पार कर गयी थी. वर्तमान में राज्य की आबादी 10.39 करोड़ है।
साथ ही शोधपत्र में यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि बढ़ती आबादी राज्य के लिये कुई चुनौतियां लेकर आयेगी। इस आबादी के लिये भोजन, गुणवत्तायुक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बेहतर जीवन स्तर उपलब्ध करना होगा। इसके लिये नीति नियंताओं को चाहिये कि वे अभी से हर सेक्टर के लिये तात्कालिक और दीर्घकालिक रोड मैप बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दें।
शोधपत्र के मुताबिक अगर शिक्षा का प्रचार-प्रसार होगा, तो आबादी को लेकर लोगों की सोच बदलेगी। शिक्षित घरों में आबादी नियंत्रण की दिशा में कदम उठ रहे हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में प्रजनन दर में गिरावट आंकी गयी है। 1981 में राज्य में कुल प्रजनन दर 5.2 थी। 1991 में यह 5.3 और 2001 में 5.4 हो गयी। 2008 में यह 3.9 तक आ गयी, जबकि शहरी क्षेत्र में यह घट कर 2.9 तक आ गयी। 10वीं या उससे अधिक पढ़े गये लोगों में यह 2.1 पायी गयी। स्नातक और उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में यह दर 1.5 पायी गयी है। कम आयवाले लोगों के बीच यह 5.0 है। अनुसूचित जाति में यह 4.9 देखी गयी है।