लॉकडाउन के बाद जिंदगी पूरी तरह से बदलने वाली है। जब तक वैज्ञानिक कोरोना संक्रमण का स्थाई ईलाज या कोई वैक्सीन नहीं ढूंढ लेते हैं तब तक जिंदगी दायरों में ही रहेगी। सोशल डिस्टेंसिग और मास्क जिंदगी का अहम हिस्सा तो बन ही जाएंगे, साथ ही लाइफ स्टाइल में भी बड़ा बदलाव देखने को होगा। वहीं ड्राइविंग की नई आदतों के साथ लोगों के मनोरंजन का तरीका भी पूरी तरह से बदल जाएगा।
सिनेमा हॉल्स पर असर
सरकार ने महामारी के संक्रमण को देखते हुए मल्टीप्लेक्स, मॉल्स, सिनेमा हॉल्स बंद कर रखे हैं। यानी ऐसी सभी वे जगह जहां लोग एक साथ जुट सकते हैं और महामारी के संक्रमण को बढ़ा सकते हैं, वे सभी सुविधाएं लॉकडाउन में बंद हैं। यह ट्रेंड आगे भी जारी रह सकता है, क्योंकि वैक्सीन का निर्माण होने और आमजन तक इसे पहुंचने में कई साल भी लग सकते हैं। तब हो सकता है कि सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक जगहों पर पाबंदी रहे। ऐसे में सबसे ज्यादा असर सिनेमा हॉल्स पर पड़ सकता है।
ड्राइव-इन सिनेमा का ट्रेंड
लेकिन सिनेमा हॉल्स की कमी ड्राइन-इन सिनेमा पूरी कर सकता है। अमेरिका, जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों में आजकल ड्राइव-इन सिनेमा का ट्रेंड चल रहा है। हालांकि भारत में फिलहाल यह काफी पॉपुलर नहीं है, लेकिन उत्तरी अमेरिका में इसके काफी दीवानें हैं। भारत में भी गुजरात, गुरुग्राम समेत कुछ जगह पर यह ट्रेंड पकड़ रहा है। हाल ही में जर्मनी की एक तस्वीर काफी वायरल हो रही है, जिसमें एक जगह पर कई गाड़ियां खड़ी हैं, और उनका मुंह एक बड़ी स्क्रीन की तरफ है। गाड़ियां एकदम शांत खड़ी हैं। जर्मनी में भी महामारी की वजह से थिएटर बंद हैं। ऐसे में ड्राइव-इन सिनेमा का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ा है।
ओपन एयर सिनेमा का लुत्फ
ड्राइव-इन सिनेमा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप लॉन्ग ड्राइव के बाद अपनी फैमिली के साथ ओपन एयर सिनेमा का लुत्फ ले सकते हैं। इसमें पार्किंग एरिया में बड़ी स्क्रीन लगी होती है, जहां लोग अपनी कार में आराम से बैठे-बैठे मूवी का मजा ले सकते हैं, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सेफ्टी भी मिलती है।
विदेश में प्रोत्साहन
जैसे जैसे लोगों में संक्रमण को लेकर जागरूकता बढ़ रही है, तो भारत में इसका प्रचलन बढ़ सकता है। कुछ देशों की सरकारों ने तो बकायदा इन्हें प्रोत्साहित भी करना शुरू दिया है, क्योंकि महामारी के चलते परंपरागत सिनेमा हॉल्स बंद हैं। लिथुआनिया में तो बकायदा विलनियस एयरपोर्ट पर ही ड्राइव-इन थिएटेर बना दिया है। वहीं दक्षिण कोरिया, जर्मनी और अमेरिका में भी ड्राइव-इन सिनेमा को प्रमोट किया जा रहा है।
क्या होता है ड्राइव-इन सिनेमा में
जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि इसमें थिएटर ओपन होता है, जो अकसर बड़े पार्किंग लॉट में बना होता है। इसमें जाकर केवल आपको अपनी कार कतार में पार्क करनी होती है। ड्राइव-इन सिनेमा में पार्किंग स्लॉट इस तरह से बनाए जाते हैं जहां से स्क्रीन का व्यू बेहतर मिलता है। बड़ी कारें और एसयूवी पीछे की तरफ खड़ी होती हैं, जबकि हैचबैक और सेडान कारें आगे की तरफ पार्क होती हैं। वहीं ड्राइव-इन थिएटर में आगे की तरफ बैंच भी लगी होती हैं, जहां बड़े परिवार बैठ कर फिल्म का मजा ले सकते हैं। यहां तक कि ड्राइन-इन में मूवी के दौरान आप फूड भी ऑर्डर कर सकते हैं।
वहीं कई ड्राइव-इन थिएटर में साथ में रेस्टोरेंट के अलावा बच्चों के लिए किड एरिया भी होता है। तकरीबन साढ़े हजार स्क्वॉयर फुट की कंक्रीट स्क्रीन पर डिजिटल प्रोजेक्टर से मूवीज चलाई जाती हैं। आमतौर पर एक ड्राइन-इन सिनेमा में दो शो चलते हैं, जिनमें एक शाम का और एक रात का शो होता है।
देश के केवल चार शहरों में
अहमदाबाद के एफटीएफ हेलमेट सर्किल स्थित ड्राइन-इन सिनेमा तो 1973 में शुरू हुआ था और वहां एक बार में 665 कारें खड़ी की जा सकती हैं। वहीं विशाखापट्टनम का ड्राइव-इन सिनेमा 2016 में शुरू हुआ था, यहां पर 324 सीटें हैं., वहीं इसकी इंडोर स्क्रीन में 220 सीटें हैं। जबकि मुंबई में पीवीआर ग्रुप का ही ड्राइव-इन थिएटर है, जिसकी क्षमता 300 कारों की है। वहीं यहां पर प्रत्येक कार के हजार रुपये लिए जाते हैं। वहीं गुरुग्राम के ड्राइव-इन सिनेमा गुड़गांव टाकीज में 150 कारों की क्षमता है। इसमें रेस्टोरेंट के अलावा पूल पार्टींज, प्राइवेट वाटर पोंड्स और मूवी देखते हुए स्पॉ की सुविधा है।