लोग नई कारों की बजाय पुरानी कारें क्यों खरीद रहे हैं?
क्रिसिल रेटिंग्स के वरिष्ठ निदेशक अनुज सेठी के अनुसार, पुरानी कारों की बढ़ती मांग के पीछे कई दिलचस्प कारण हैं:
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पहली बार कार खरीदने वालों की बड़ी संख्या:
पुरानी कारों के कुल लेन-देन में लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी ऐसे लोगों की है, जो जिंदगी में पहली बार कार खरीद रहे हैं।
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बजट और महंगे होते नए वाहन:
नई कारों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में जो लोग कार का सपना पूरा करना चाहते हैं, उनके लिए पुरानी कार खरीदना एक किफायती रास्ता बन गया है।
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कम कीमत में बेहतर फीचर्स:
पुरानी कारों का बाजार ग्राहकों को यह आजादी देता है कि वे अपने सीमित बजट में भी अधिक सुविधाओं और प्रीमियम फीचर्स वाली गाड़ियां खरीद सकें।
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डिजिटल माध्यमों ने बढ़ाया भरोसा:
पहले पुरानी कार खरीदने में भरोसे की कमी होती थी। लेकिन अब डिजिटल माध्यमों के आने से पारदर्शिता बढ़ी है। गाड़ियों की जांच के मानक बेहतर हुए हैं और कर्ज यानी लोन मिलना भी आसान हो गया है।
पुरानी कारों को खरीदने पर ग्राहकों को असल में कितनी बचत हो रही है?
क्रिसिल ने 5 साल की मालिकाना अवधि के आधार पर पुरानी कारों की बचत का विश्लेषण किया है:
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छोटे वाहनों पर बचत:
अगर कोई ग्राहक नई हैचबैक या सेडान कार की जगह पुरानी कार खरीदता है, तो उसे नई कार के मुकाबले लगभग 25 प्रतिशत तक की बचत होती है।
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उपयोगिता वाहनों पर बचत:
वहीं, पुरानी बड़ी उपयोगिता गाड़ियों को खरीदने पर ग्राहकों को करीब 20 प्रतिशत तक का फायदा होता है।
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कर में बदलाव का असर:
पिछले वित्तीय वर्ष में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी के नियमों में बदलाव के बावजूद पुरानी कारों की मांग मजबूत बनी हुई है। क्योंकि कर में हुए बदलावों से नई और पुरानी कारों के बीच की कीमतों का अंतर सिर्फ 4 से 6 प्रतिशत ही कम हुआ है।
बाजार में पुरानी कारों की उपलब्धता और उनकी औसत उम्र में क्या बदलाव आया है?
सप्लाई के मोर्चे पर एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक दशक पहले तक बाजार में बिकने वाली पुरानी कारों की औसत उम्र 8 साल से अधिक हुआ करती थी।
लेकिन अब, बिकने वाली पुरानी कारों की औसत उम्र घटकर लगभग 4 साल रह गई है। इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं:
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ऑटो कंपनियों द्वारा कारों के नए मॉडल बहुत तेजी से पेश किए जा रहे हैं।
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लोगों द्वारा अपनी कार को बदलकर दूसरी कार लेने की समयसीमा अब काफी कम हो गई है।
असंगठित बनाम संगठित बाजार और मुनाफे की क्या स्थिति है?
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संगठित बाजार की बढ़ती हिस्सेदारी:
वित्त वर्ष 2022 में संगठित बाजार की हिस्सेदारी 20 से 21 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 26 प्रतिशत हो गई है। हालांकि, बाजार के कुल लेन-देन में अभी भी असंगठित क्षेत्र का दबदबा है।
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विकसित देशों से तुलना:
भले ही हमारा बाजार बढ़ रहा है, लेकिन भारत का पुरानी और नई कारों की बिक्री का अनुपात अभी भी विकसित बाजारों के 2.5 से 3.5 गुना के स्तर से काफी नीचे है।
संगठित बाजार के भीतर कंपनियों के मुनाफे और व्यापार के तरीकों को लेकर क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक पूनम उपाध्याय ने बताया:
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डिजिटल प्लेटफॉर्म्स:
संगठित बाजार के 85 प्रतिशत लेन-देन ऐसे डिजिटल माध्यमों द्वारा होते हैं जो खुद गाड़ियों का स्टॉक नहीं रखते। इस तरीके के कारण वे मुनाफे में आ चुके हैं और उन्हें बाहरी निवेश की जरूरत नहीं पड़ी।
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स्टॉक आधारित कंपनियां:
बचे हुए 15 प्रतिशत लेन-देन वे कंपनियां करती हैं जो खुद कारें खरीदकर बेचती हैं। इन्होंने पिछले दो वर्षों में करीब 3,000 करोड़ रुपये का निवेश जुटाया है। हालांकि इनकी लागत ज्यादा है, लेकिन अब ये भी खर्चों में कटौती करके अपने घाटे को कम कर रही हैं। अब भविष्य में निवेश का उपयोग घाटे की भरपाई के लिए नहीं, बल्कि व्यापार के विस्तार के लिए किया जाएगा।
भविष्य में इस क्षेत्र को कौन-से मुख्य कारण प्रभावित करेंगे?
रिपोर्ट में बताया गया है कि आने वाले समय में इस क्षेत्र की दिशा इन बातों पर निर्भर करेगी:
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बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाली पुरानी कारों की पर्याप्त उपलब्धता।
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कर बदलाव के कारण कारों की बची हुई कीमत में होने वाला उतार-चढ़ाव।
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पुरानी कारों के लिए लोन सुविधाओं की बढ़ती पहुंच।
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संगठित कंपनियों द्वारा मुनाफे में आने की गति।