छोटी कारों को छूट देने के विरोध में कौन है और क्यों?
टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ शैलेश चंद्रा ने नवंबर में कहा था कि छोटी कारों को CAFE-III मानकों में ढील देना सुरक्षा फीचर्स से समझौता कर सकता है। और यह सस्टेनेबल मोबिलिटी की दिशा में ठोस कदमों से ध्यान भटका सकता है। उनके अनुसार, सभी कारों के लिए समान और सख्त मानक जरूरी हैं।
छोटी कारों के पक्ष में कौन सा तर्क दिया जा रहा है?
देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया इस मुद्दे पर अलग राय रखती है। कंपनी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव का कहना है कि CAFE मानकों का मूल उद्देश्य बड़ी और ज्यादा ईंधन खपत करने वाली कारों को ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट बनाना और उत्सर्जन कम करना था। उनका तर्क है कि छोटी कारों पर अतिरिक्त बोझ डालने से उनकी किफायत और बाजार दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
CAFE मानक क्या हैं और इन्हें कब लागू किया गया था?
CAFE मानकों की शुरुआत 2017 में की गई थी। इनका उद्देश्य किसी भी कार निर्माता के पूरे वाहन बेड़े (फ्लीट) के औसत ईंधन उपभोग और CO₂ उत्सर्जन पर एक सीमा तय करना है। ताकि कंपनियां बेहतर फ्यूल एफिशिएंसी और कम प्रदूषण वाली गाड़ियां विकसित करें।
CAFE-II और CAFE-III के बीच क्या अंतर है?
CAFE-III के लिए नए तकनीकी मानदंडों और परिभाषाओं पर अभी चर्चा चल रही है।
नए नियमों पर चर्चा और आगे की प्रक्रिया क्या है?
ऊर्जा मंत्रालय के अंतर्गत ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) ने इस साल सितंबर में CAFE-III का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया था और हितधारकों से सुझाव मांगे थे। अब, सभी चर्चाओं और फीडबैक के बाद तैयार प्रस्ताव को पीएमओ को भेज दिया गया है। जहां से आगे इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
निर्णायक चरण
CAFE-III मानकों को लेकर सरकार और ऑटो इंडस्ट्री के बीच मंथन अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका है। अब सबकी नजर पीएमओ के फैसले पर टिकी है, जो यह तय करेगा कि छोटी कारों को रियायत मिलेगी या सभी वाहनों पर समान रूप से सख्त ईंधन दक्षता मानक लागू होंगे।