मामले की सुनवाई के दौरान उपभोक्ता आयोग ने क्या अवलोकन किया?
अध्यक्ष बी उमा वेंकट सुब्बा लक्ष्मी और सदस्य सी लक्ष्मी प्रसन्ना व बी राजी रेड्डी की पीठ ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत संवाद, जॉब कार्ड और सर्विस रिकॉर्ड की जांच की। फोरम ने पाया कि खरीदार ने खरीदारी के कुछ दिनों के भीतर ही स्मार्ट-की और सेंट्रल-लॉकिंग की समस्याओं की सूचना दे दी थी और डीलर ने भी इन्हें स्वीकार किया था।
आयोग ने टिप्पणी की:
"रिकॉर्ड के अवलोकन से स्पष्ट है कि 21 अगस्त के जवाब (Ex.A6) के अनुसार शिकायतकर्ता ने वाहन खरीदने के कुछ ही दिनों के भीतर स्मार्ट की 'आउट ऑफ रेंज' और सेंट्रल लॉकिंग सिस्टम के खराब होने की शिकायत की थी, जिसे विपक्षी पार्टी के कर्मचारियों ने स्वीकार किया था। दोनों पक्षों के बीच चैट (Ex.A5 और Ex.A6) से यह भी साबित होता है कि वाहन बीच रास्ते में रुक गया था और शिकायतकर्ता ने इसकी रिपोर्ट की थी।"
सर्विस हिस्ट्री से पता चला कि वाहन के लॉक न होने, अनलॉक न होने और स्टार्ट न होने की शिकायतें बार-बार दर्ज की गईं। आयोग ने कहा कि डीलर इन समस्याओं का सही कारण बताने में विफल रहा और मरम्मत के बाद भी दिक्कतें बनी रहीं।
आयोग ने आगे कहा:
"निर्माता से डीलर को वाहन सौंपने की तारीख का कोई सबूत पेश नहीं किया गया है। साक्ष्यों के अभाव में, यह नहीं कहा जा सकता कि यदि ग्राहक को खराब वाहन डिलीवर किया गया है तो डीलर जिम्मेदार नहीं है। इस मामले में विशेषज्ञ साक्ष्य का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि जॉब कार्ड से साफ जाहिर है कि शिकायत दर्ज कराने के बाद भी स्मार्ट-की और सेंट्रल लॉकिंग की समस्या बनी हुई है।"
आयोग ने कितना मुआवजा तय किया और डीलर को क्या निर्देश दिए?
आयोग ने माना कि सबूतों से सेवा में कमी की पुष्टि होती है, इसलिए बिक्री करने वाला डीलर 10 प्रतिशत मूल्यह्रास काटकर वाहन की कीमत लौटाने के लिए उत्तरदायी है। चूंकि वाहन लोन पर लिया गया था, इसलिए ग्राहक उचित मुआवजे का हकदार है।
हालांकि, मानसिक परेशानी के लिए मांगी गई 10 लाख रुपये की बड़ी राशि को खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि मुआवजा न्यायसंगत और तर्कसंगत होना चाहिए, यह
"कोई बड़ा लाभ या मुनाफे का साधन नहीं हो सकता।"
आयोग का अंतिम फैसला:
- डीलर को निर्देश दिया गया कि वह 26,64,761.90 रुपये में से 10 प्रतिशत मूल्यह्रास काटकर राशि ग्राहक को लौटाए और बदले में वाहन वापस ले।
- ग्राहक को 50,000 रुपये मुआवजा और 15,000 रुपये कानूनी खर्च का भुगतान किया जाए।
- इस आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करना होगा। तय समय पर भुगतान न करने पर रिफंड राशि पर आदेश की तारीख से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।