सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि बीमा कंपनियां केवल इसलिए दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकतीं, क्योंकि वाहन अपने निर्धारित मार्ग से भटक गया था या परमिट की शर्तों का उल्लंघन हुआ था। अदालत का कहना है कि अगर बीमा कंपनियों ने मुआवजे से इनकार किया तो ऐसा न्याय और सामाजिक सरोकार के सिद्धांतों के खिलाफ होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा पॉलिसी का मकसद सुरक्षा देना है, बहाने बनाना नहीं। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि 'बीमा पॉलिसी का उद्देश्य वाहन मालिक या ऑपरेटर को ऐसी अप्रत्याशित या दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से सुरक्षा देना है, जिनमें तीसरे पक्ष को नुकसान पहुंचता है। पीड़ित या उसके परिजनों को केवल इसलिए मुआवजा न देना कि हादसा परमिट क्षेत्र से बाहर हुआ है, यह न्याय के विरुद्ध है।'
किस मामले पर आया यह निर्णय?
यह मामला वर्ष 2014 का है जब 7 अक्टूबर को एक मोटरसाइकिल सवार को एक बस ने तेज और लापरवाह ड्राइविंग के चलते टक्कर मारी थी। हादसे में मोटरसाइकिल सवार की मौके पर ही मौत हो गई थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने मृतक के परिजनों को ब्याज सहित 18.86 लाख रुपए का मुआवजा देने का आदेश दिया था। घटना पर हाईकोर्ट ने कहा, पहले बीमा कंपनी को पीड़ित को मुआवजा देना चाहिए और बाद में मालिक से पैसे वसूलने चाहिए। जिस पर बीमा कंपनी और बस मालिक दोनों ने अधिकरण के फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। चुनौती पर हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि वह पहले मुआवजा राशि पीड़ित परिवार को दे और बाद में वह राशि वाहन मालिक से वसूल करे।
सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित के पक्ष में सुनाया फैसला
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो दोनों अपीलें की खारिज कर दी गईं। बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए यह तर्क दिया कि वाहन परमिट क्षेत्र से बाहर था, इसलिए बीमा पॉलिसी लागू नहीं होती। वहीं, वाहन मालिक ने यह कहा कि बीमा कंपनी को ही भुगतान की जिम्मेदारी उठानी चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलें खारिज करते हुए कहा कि, 'पीड़ित या उसके परिजन किसी गलती के दोषी नहीं थे। बीमा कंपनी को मुआवजा देना ही होगा, चाहे वाहन ने परमिट की शर्तों का उल्लंघन ही क्यों न किया हो।'
क्यों अहम है यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने की मिसाल बनेगा। अदालत ने साफ किया है कि सड़क हादसे में पीड़ित व्यक्ति के अधिकार किसी तकनीकी कारण से नहीं छीने जा सकते।