Luxury Car Fire And Insurance Claim
- फोटो : Amar Ujala
महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को एक झटका देते हुए बीमा दावे के भुगतान का आदेश दिया है। आयोग ने बीमा कंपनी को एक बीएमडब्ल्यू (BMW) कार मालिक को 70 लाख रुपये का क्लेम भुगतान करने का निर्देश दिया है।
यह मामला तब शुरू हुआ जब 8 मार्च 2012 की देर रात हाईवे पर टायर पंचर होने के कारण कार चालक ने बीएमडब्ल्यू को सड़क के किनारे सुरक्षित पार्क कर लॉक कर दिया था। अगली सुबह कार पूरी तरह जली हुई पाई गई। बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज किए जाने के बाद कार मालिक रविकांत एस. पाटिल ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया था। 16 सितंबर 2026 को दिए अपने फैसले में आयोग ने बीमा कंपनी के फैसले को सेवा में कमी माना।
बीमा कंपनी ने 70 लाख रुपये का क्लेम खारिज करने के पीछे क्या तर्क दिए थे?
कार मालिक पाटिल ने दिसंबर 2011 में 70 लाख रुपये की बीमित घोषित मूल्य (IDV) पर 1,65,996 रुपये का प्रीमियम भरकर बीमा खरीदा था। हालांकि, बीमा कंपनी ने पॉलिसी की 'शर्त 4' का हवाला देते हुए क्लेम को खारिज कर दिया था। कंपनी के मुख्य तर्क इस तरह थे:
- लापरवाही का आरोप: कंपनी का दावा था कि कार को बिना किसी देखरेख के सड़क पर छोड़ना पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। चालक को कार के अंदर ही रुकना चाहिए था या उसे किसी पास के ढाबे या गांव में ले जाना चाहिए था।
- स्पेयर व्हील का इस्तेमाल न करना: कंपनी ने सवाल उठाया कि स्पेयर टायर का इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया या दूसरी गाड़ी से कार को टो करके वापस क्यों नहीं ले जाया गया।
- आग के कारण पर संदेह: बीमा कंपनी ने दलील दी कि स्पॉट पंचनामे में कार से 50 मीटर दूर जली हुई घास मिली थी, जिससे आग लगने का कारण संदिग्ध लगता है। इसके अलावा, कंपनी ने कार की वैल्यू घटकर 59 लाख रुपये होने का भी दावा किया था।
उपभोक्ता आयोग ने इंश्योरेंस कंपनी की दलीलों को क्यों खारिज कर दिया?
पीठासीन सदस्य पूनम वी. महर्षि और सदस्य डॉ. निशा अमोल चव्हाण की पीठ ने बीमा कंपनी की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि चालक का फैसला व्यावहारिक और सुरक्षा की दृष्टि से सही था:
- उचित सावधानी बरती गई: आयोग ने पाया कि देर रात धूलखेड में कोई मैकेनिक उपलब्ध नहीं था। चालक ने कार को चाचा ढाबा के पास सड़क किनारे खड़ा किया, खिड़कियां बंद कीं और कार को सुरक्षित लॉक कर दिया। यह दिखाता है कि पूरी सावधानी बरती गई थी।
- जान जोखिम में डालने की मजबूरी नहीं: कोर्ट ने रात में गाड़ी के अंदर रहने की बीमा कंपनी की दलील को असंवेदनशील और बेतुका बताया। आयोग ने कहा, "कानून किसी बीमित व्यक्ति या उसके कर्मचारी को एक घटती हुई संपत्ति की रखवाली के लिए अपनी जान या शारीरिक सुरक्षा को जोखिम में डालने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।"
- आग का सीधा संबंध नहीं: पुलिस और फायर ब्रिगेड के रिकॉर्ड में आग का सटीक कारण स्पष्ट नहीं था। बीमा कंपनी यह साबित करने में विफल रही कि कार को लॉक करके छोड़ने की वजह से ही आग लगी।
- IDV ही अंतिम मूल्य: आयोग ने स्पष्ट किया कि जब 70 लाख रुपये की IDV पर प्रीमियम लिया गया है, तो कुल नुकसान के मामले में कंपनी एकतरफा मूल्य घटाकर 59 लाख रुपये नहीं कर सकती।
कंज्यूमर कोर्ट ने बीमा कंपनी को क्या-क्या भुगतान करने का आदेश दिया?
महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने कार मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को निम्नलिखित भुगतान करने का सख्त आदेश जारी किया है:
- IDV क्लेम: कार की पूरी इंस्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू 70 लाख रुपये का भुगतान।
- वार्षिक ब्याज: क्लेम खारिज होने की तारीख (23 नवंबर 2012) से वास्तविक भुगतान तक 70 लाख रुपये पर 7% वार्षिक ब्याज।
- मानसिक क्षतिपूर्ति: मानसिक उत्पीड़न और परेशानी के मुआवजे के रूप में 50,000 रुपये।
- कानूनी खर्च: अदालती कार्यवाही के खर्च के रूप में 25,000 रुपये।