यह पूरा विवाद कैसे शुरू हुआ था और ग्राहक की क्या शिकायत थी?
यह मामला 23 जनवरी 2015 को शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता ने डीलर से नई कार खरीदी थी।
- कंपनी का दावा: डीलर ने बिक्री के वक्त औसतन 18.5 किमी प्रति लीटर माइलेज देने का वादा किया था।
- ग्राहक का अनुभव: कार डिलीवरी के कुछ समय बाद ग्राहक ने शिकायत दर्ज कराई कि कार असल में केवल 5 किमी प्रति लीटर का माइलेज दे रही है। ग्राहक ने आरोप लगाया कि गाड़ी में गंभीर मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (उत्पादन खराबी) है और उसने 7.27 लाख रुपये के रिफंड या कार बदलने की मांग की।
डीलर और कार निर्माता कंपनी ने अदालत में क्या दलीलें दीं?
डीलर ने स्वीकार किया कि शिकायत के बाद की गई टेस्टिंग में कार का माइलेज 8 से 10 किमी प्रति लीटर पाया गया था। हालांकि, डीलर और कंपनी दोनों ने किसी भी तरह के मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट से इनकार किया।
कंपनी और डीलर की मुख्य दलीलें:
- विभिन्न कारकों पर निर्भरता: माइलेज काफी हद तक सड़क की स्थिति, पेट्रोल की गुणवत्ता, ड्राइविंग की आदतों, टायर प्रेशर, मौसम, गाड़ी के वजन और मेंटेनेंस पर निर्भर करता है।
- हाईवे माइलेज का दावा: डीलर ने कहा कि इस मॉडल की समान गाड़ियां हाईवे पर 15 से 18 किमी प्रति लीटर तक का माइलेज दे सकती हैं।
- संतुष्टि पत्र: कंपनी ने 'ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया' (ARAI) की टेस्टिंग और 19 अगस्त 2016 के रिपेयर ऑर्डर पर ग्राहक द्वारा हस्ताक्षरित संतोष पत्र का हवाला देकर दावा किया कि समस्या सुलझा दी गई थी।
राज्य उपभोक्ता आयोग का अंतिम फैसला क्या रहा?
इससे पहले मल्लपुरम जिला उपभोक्ता फोरम ने कंपनी और डीलर को पूरी कार बदलने या 7.27 लाख रुपये रिफंड करने का आदेश दिया था। हालांकि, राज्य आयोग ने इस फैसले में संशोधन किया:
- चूंकि वाहन लगातार ग्राहक के पास ही रहा और कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट साबित नहीं हुआ। इसलिए कार बदलना या पूरी कीमत रिफंड करना उचित नहीं होगा।
- सेवा में कमी के एवज में आयोग ने मुआवजे की राशि को जिला फोरम के 25,000 रुपये से बढ़ाकर 75,000 रुपये कर दिया।