क्या है E20 पेट्रोल का असली विलेन और कैसे होता है 'फेज सेपरेशन'?
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल में पानी का मिलना एक ऐसी रासायनिक प्रक्रिया को जन्म देता है, जो पेट्रोल पंप के टैंक से सीधे आपकी गाड़ी में पहुंच जाती है:
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इथेनॉल का नमी सोखना:
इथेनॉल स्वभाव से ही नमी के प्रति संवेदनशील होता है, यानी यह अपने आसपास के वातावरण से पानी (नमी) को आसानी से सोख लेता है। सामान्य परिस्थितियों में यह कोई समस्या नहीं पैदा करता क्योंकि यह पेट्रोल के साथ समान रूप से घुला रहता है।
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अंडरग्राउंड टैंक में पानी का रिसाव:
मॉनसून के दौरान बारिश का पानी, खराब सील, कंडेनसेशन (भाप का पानी बनना) या अन्य कारणों से जब पेट्रोल पंपों के भूमिगत स्टोरेज टैंकों में पानी घुस जाता है, तो खेल बिगड़ जाता है। ऐसी स्थिति में इथेनॉल पेट्रोल का साथ छोड़कर पानी के साथ बॉन्डिंग (जुड़ाव) बना लेता है।
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फेज सेपरेशन:
पानी और इथेनॉल का यह भारी मिश्रण आपस में मिलकर स्टोरेज टैंक की बिल्कुल निचली सतह पर बैठ जाता है, जबकि शुद्ध पेट्रोल इसके ऊपर तैरने लगता है।
गंभीर परिणाम: चूंकि पेट्रोल पंप की डिस्पेंसर मशीनें टैंक के बिल्कुल निचले हिस्से से ही ईंधन खींचती हैं, इसलिए कई बार गाड़ियों के फ्यूल टैंक में सही E20 पेट्रोल जाने के बजाय पानी से भरा यह खतरनाक इथेनॉल मिश्रण चला जाता है।
दूषित E20 ईंधन आपकी कार में क्या-क्या तबाही मचा सकता है?
उद्योग विशेषज्ञों और पेट्रोल पंप डीलरों के अनुसार, यदि आपकी गाड़ी में यह पानी मिला दूषित ईंधन चला जाता है, तो कार में ये लक्षण दिखाई देने लगते हैं:
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इंजन स्टार्ट होने में भारी दिक्कत:
कार को स्टार्ट करने में बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।
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इंजन मिसफायर और वाइब्रेशन:
गाड़ी चलाते समय इंजन बीच-बीच में झटका मारता है और कार में असामान्य कंपन महसूस होता है।
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पिकअप और पावर में कमी:
गाड़ी की रफ्तार अचानक कम होने लगती है और इंजन अपनी पूरी ताकत नहीं लगा पाता।
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चलते-चलते गाड़ी बंद होना:
कुछ दूरी तक ठीक-ठाक चलने के बाद कार अचानक सड़क पर ही बंद हो जाती है।
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खराब इंजन परफॉर्मेंस:
गाड़ी चलाने का पूरा अनुभव और इंजन की कार्यक्षमता बेहद खराब हो जाती है।
अहम बात: विशेषज्ञों का साफ कहना है कि ये समस्याएं E20 पेट्रोल की वजह से नहीं, बल्कि उसमें पानी घुसने के कारण पैदा होती हैं। एक सही तरीके से इंजीनियर की गई E20-अनुकूल कार इस ईंधन पर पूरी तरह सुरक्षित चलती है, बशर्ते ईंधन की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो।
मानसून और तटीय इलाकों में यह चिंता क्यों और ज्यादा बढ़ जाती है?
सोशल मीडिया पर कुछ समय से ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों में कीचड़ जैसा या पानी मिला दूषित ईंधन भरते हुए दिखाया गया है। इसके बाद से डीलरों और ऑपरेटरों की चिंताएं इन कारणों से बढ़ गई हैं:
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मानसून का खतरा:
बारिश के दिनों में अंडरग्राउंड टैंकों में पानी के रिसाव की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।
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तटीय क्षेत्रों की चुनौती:
समुद्र तटीय इलाकों में जमीन के नीचे का जलस्तर ऊपर होता है। अगर टैंकों की सील थोड़ी भी कमजोर हुई या नमी अंदर गई, तो 'फेज सेपरेशन' का खतरा दोगुना हो जाता है।
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पाइपलाइनों में जंग का डर:
कुछ ऑपरेटरों को डर है कि इथेनॉल द्वारा पानी सोखने की प्रवृत्ति के कारण माइल्ड-स्टील के टैंकों और पाइपलाइनों में लंबे समय में जंग लग सकती है। हालांकि, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने E20 रोलआउट के तहत पहले ही कई डिस्पेंसिंग पुर्जों, जैसे सील और वाशर को अपग्रेड कर दिया है।
इस खतरे से निपटने के लिए पेट्रोल पंपों पर क्या कड़े कदम उठाए जा रहे हैं?
ईंधन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए तेल कंपनियों और पेट्रोल पंप डीलरों ने अपनी जांच प्रक्रिया को काफी कड़ा कर दिया है:
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वाटर-फाइंडिंग पेस्ट का उपयोग:
तेल कंपनियों ने डीलरों को निर्देश दिए हैं कि वे 'वाटर-फाइंडिंग पेस्ट' लगी डिपस्टिक (एक प्रकार की छड़) के जरिए नियमित रूप से भूमिगत टैंकों की जांच करें।
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मॉनसून में बार-बार जांच:
बारिश के मौसम में यह निरीक्षण काफी बढ़ा दिया जाता है। यदि टैंक में पानी का पता चलता है, तो तेल कंपनियां गाड़ी में ईंधन भरने से पहले उस जमे हुए पानी को बाहर निकालती हैं।
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डीलरों का वित्तीय नुकसान:
पेट्रोल पंप डीलरों का कहना है कि दूषित ईंधन को फेंकने के कारण उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए उन्होंने सरकार से इसके सुरक्षित निपटान की स्पष्ट गाइडलाइंस मांगी हैं।
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इंडियन ऑयल की 'जीरो टॉलरेंस' नीति:
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) ने साफ किया है कि वे ईंधन की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करते। उनकी एक 'जीरो-टॉलरेंस' नीति है, जिसके तहत औचक निरीक्षण, सरप्राइज ऑडिट और वैज्ञानिक क्वालिटी टेस्ट किए जाते हैं। मिलावट या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाती है।
मारुति और टोयोटा के किन दो हालिया मामलों ने इस विवाद को चर्चा में ला दिया?
हाल ही में देश की दो दिग्गज कार कंपनियों के बड़े मामलों ने ईंधन के दूषित होने की इस बहस को देश के सामने ला खड़ा किया:
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मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा (रायपुर केस): रायपुर के एक उपभोक्ता फोरम ने ग्राहक के दावे को स्वीकार करते हुए मारुति को गाड़ी बदलने या पैसे रिफंड करने का आदेश दिया था। क्योंकि ग्राहक का आरोप था कि कार E20 अनुकूल नहीं थी। हालांकि, मारुति सुजुकी ने इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी है। कंपनी का कड़ा तर्क है कि उनकी ग्रैंड विटारा पूरी तरह E20-अनुकूल है। और कार में आई खराबी इथेनॉल के कारण नहीं, बल्कि पेट्रोल में पानी/कंटैमिनेशन (ईंधन के दूषित होने) की वजह से आई थी।
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टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस (बिहार केस): बिहार के एक टोयोटा इनोवा हाइक्रॉस मालिक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने E20 पेट्रोल से दिक्कत होने का दावा किया था। टोयोटा ने जब कार की वैज्ञानिक जांच की, तो पाया कि गाड़ी पूरी तरह से E20 के लिए प्रमाणित और सुरक्षित है। खराबी की असली वजह गाड़ी के टैंक में मौजूद दूषित ईंधन था। तकनीशियनों ने कार के फ्यूल सिस्टम को साफ किया, उसमें नया E20 पेट्रोल भरा और गाड़ी बिल्कुल सामान्य रूप से चलने लगी। जिसके बाद उसे ग्राहक को सौंप दिया गया।
ग्राहक क्या करें
अगर आपकी कार निर्माता कंपनी कहती है कि गाड़ी E20-कम्पैटिबल है, तो वह सुरक्षित है। असली लड़ाई ईंधन के मिश्रण से नहीं, बल्कि उसकी शुद्धता से है। गाड़ी चाहे E20 हो या सामान्य, पानी या गंदगी मिला ईंधन किसी भी इंजन को तबाह कर सकता है। इसलिए हमेशा भरोसेमंद और प्रतिष्ठित पेट्रोल पंपों से ही तेल भरवाएं।