क्या है वह नियम जिससे ऑटो कंपनियां संकट में हैं?
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जनवरी 2025 में अधिसूचित नियमों ने इस संकट को जन्म दिया है:
-
नियम 4 (6): इस नियम के अनुसार, यदि कोई निर्माता अपना परिचालन बंद करता है, तो भी उसे बाजार में पहले से मौजूद वाहनों के लिए अपनी 'विस्तारित निर्माता जिम्मेदारी' (EPR) का पालन करना होगा।
-
अकाउंटिंग स्टैंडर्ड (IND AS 37): इस नियम के कारण 'इंड एएस 37' लागू हो गया है। इसके तहत कंपनियों को पिछले 20 वर्षों में बेचे गए निजी वाहनों और 15 वर्षों में बेचे गए वाणिज्यिक वाहनों के लिए पर्यावरण मुआवजे का प्रावधान करना अनिवार्य हो गया है।
ऑटो निर्माताओं के मुनाफे पर इसका क्या असर पड़ेगा?
भले ही कंपनियां बाजार से बाहर न निकल रही हों, फिर भी उन्हें पुराने वाहनों के लिए ईपीआर (EPR) फंड सुरक्षित रखना होगा:
-
प्रॉफिट में गिरावट: एक बार जब यह प्रावधान लेखांकन पुस्तकों (अकाउंटिंग बुक्स) में दर्ज हो जाएगा, तो उस वर्ष पूरे ऑटो उद्योग का मुनाफा काफी कम हो जाएगा।
-
निवेश में बाधा: विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि फंसने से कंपनियों की नई तकनीकों में निवेश करने और अपनी विकास योजनाओं को आगे बढ़ाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
किस सेगमेंट पर कितना वित्तीय बोझ पड़ेगा?
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 25,000 करोड़ रुपये का यह भार अलग-अलग सेगमेंट में इस प्रकार बंटा है:
-
चार पहिया वाहन निर्माता: लगभग 14,623 करोड़ रुपये का कुल प्रभाव।
-
दो और तीन पहिया वाहन निर्माता: वित्त वर्ष 26 के लिए अनुमानित 9,650 करोड़ रुपये का प्रभाव।
SIAM ने सरकार से क्या मांग की है?
वाहन निर्माताओं की संस्था सियाम (SIAM) ने इस मुद्दे को मंत्रालय के सामने उठाया है:
-
प्रारंभिक अनुमान: सियाम ने मंत्रालय को लिखे पत्र में बताया कि ग्रॉस आधार पर इसका एकमुश्त प्रभाव 25,000 करोड़ रुपये (डिस्काउंटेड आधार पर 9,000 करोड़ रुपये) हो सकता है।
-
संशोधन की मांग: सियाम ने मांग की थी कि नियम 4(6) में संशोधन कर यह स्पष्ट किया जाए कि संचयी बजटीय प्रावधान की आवश्यकता नहीं है।
-
मंत्रालय का रुख: हालांकि, मंत्रालय ने 27 मार्च 2026 को जारी अपने संशोधन अधिसूचना में इस क्लॉज में कोई बदलाव नहीं किया है।
यह नीति भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के मुनाफे में एक बड़ा छेद करने वाली है। 25,000 करोड़ रुपये की यह कटौती न केवल कंपनियों के बैलेंस शीट को प्रभावित करेगी। बल्कि भविष्य में नई तकनीकों और ईंधन विकल्पों पर होने वाले शोध व विकास की गति को भी धीमा कर सकती है।