क्या आप जानते हैं कि भारत का सड़क नेटवर्क दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है? हमारे देश में करीब 66.71 लाख किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल बिछा हुआ है। वर्ष 2026 की शुरुआत तक, भारत की सड़कों को उनके काम, बनावट और कनेक्टिविटी के आधार पर मुख्य रूप से 7 हिस्सों में बांटा गया है।
देश के ट्रांसपोर्ट सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने के लिए सड़कों को इन 7 कैटेगरी में बांटा गया है:
एक्सप्रेसवे (हाई-स्पीड सड़कें): यह सबसे टॉप क्लास और हाई-स्पीड सड़कें होती हैं। इनमें एक्सेस-कंट्रोल होता है (यानी आप हर कहीं से इन पर चढ़ या उतर नहीं सकते)। उदाहरण: दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे।
एक्सप्रेसवे भारत की सबसे आधुनिक और हाई-टेक सड़कें हैं, जिन्हें रफ्तार और सुरक्षा के तालमेल के साथ डिजाइन किया गया है। ये आमतौर पर 6 से 8 लेन वाले डिवाइडर युक्त हाईवे होते हैं, जहां कारों के लिए 120 किमी/घंटा की टॉप स्पीड तय की गई है। इनकी सबसे बड़ी खूबी इनका 'एक्सेस-कंट्रोल्ड' होना है, जिसका मतलब है कि आप बीच में कहीं से भी इन पर नहीं चढ़ सकते, जिससे ट्रैफिक का फ्लो बना रहता है।
अगर पिछले कुछ वर्षों की प्रगति देखें, तो भारत में एक्सप्रेसवे का जाल बेहद तेजी से फैला है। साल 2014 में जहां देश में केवल 93 किमी एक्सप्रेसवे थे, वहीं 2026 की शुरुआत तक यह आंकड़ा बढ़कर 3,000 किमी को पार कर चुका है और आज देश में 50 से अधिक एक्सप्रेसवे पूरी तरह चालू हैं। वर्तमान में दिल्ली-मुंबई, पूर्वांचल, आगरा-लखनऊ और ईस्टर्न पेरिफेरल जैसे एक्सप्रेसवे सफर को आसान बना रहे हैं। आने वाले समय में गंगा एक्सप्रेसवे (जो पूरा होने पर सबसे लंबा होगा) और दिल्ली-अमृतसर-कटरा जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स भारत की कनेक्टिविटी को एक नई ऊंचाई पर ले जाएंगे।
'भारतमाला परियोजना' के तहत भारत सरकार का पूरा ध्यान देश में लॉजिस्टिक (माल ढुलाई) की लागत को कम करने और रफ्तार बढ़ाने पर है, जिसके लिए हाई-स्पीड कॉरिडोर विकसित किए जा रहे हैं। इन कॉरिडोर का मुख्य उद्देश्य बड़े औद्योगिक क्षेत्रों (Industrial Zones) को आपस में जोड़ना है ताकि ट्रकों और सामान की आवाजाही बिना किसी बाधा के तेजी से हो सके। सरकार ने देश भर में 22 से अधिक ऐसे कॉरिडोर शुरू करने का लक्ष्य रखा है, जिनसे सफर के समय में 40% से 50% तक की भारी कमी आने की उम्मीद है।
अक्सर लोग एक्सप्रेसवे और कॉरिडोर को एक ही मान लेते हैं, लेकिन इनके बीच एक बुनियादी अंतर है। एक्सप्रेसवे असल में एक 'सड़क का प्रकार' है, जिसे उसकी हाई-स्पीड और खास बनावट (एंट्री-एग्जिट कंट्रोल) के लिए जाना जाता है। वहीं, कॉरिडोर एक 'व्यापक आर्थिक कॉन्सेप्ट' है, जो दो बड़े व्यापारिक केंद्रों के बीच के पूरे रूट को दर्शाता है। एक ही इकोनॉमिक कॉरिडोर के अंदर कई अलग-अलग एक्सप्रेसवे और नेशनल हाईवे शामिल हो सकते हैं, जो मिलकर व्यापार के पहिए को गति देते हैं।
आसान शब्दों में कहें तो पेरिफेरल एक्सप्रेसवे किसी बड़े शहर के बाहरी घेरे पर बना एक 'हाई-स्पीड रिंग रोड' होता है। इसका मुख्य उद्देश्य शहर के अंदरूनी ट्रैफिक को भारी वाहनों के दबाव से मुक्त करना है। अक्सर ऐसे ट्रक या वाहन जिन्हें शहर के अंदर कोई काम नहीं होता और जिन्हें सिर्फ शहर को पार करके आगे जाना होता है, वे इस पेरिफेरल रोड का इस्तेमाल करते हैं। इससे न केवल शहर के भीतर ट्रैफिक जाम की समस्या कम होती है, बल्कि गाड़ियों के धुएं से होने वाले प्रदूषण में भी भारी गिरावट आती है।
जब कोई नया एक्सप्रेसवे पहले से मौजूद किसी सड़क का विस्तार करने के बजाय, पूरी तरह से नई और खाली जमीन (जैसे खेतों या खुले मैदानों) पर बनाया जाता है, तो उसे 'ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट' कहा जाता है। यह पुराने हाईवे को चौड़ा करने के मुकाबले कहीं ज्यादा आधुनिक और कुशल तरीका है। पुराने रास्तों पर काम करने (जिसे ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट कहते हैं) में ट्रैफिक को संभालना, अतिक्रमण हटाना और जमीन का अधिग्रहण करना एक बड़ी चुनौती होती है, जिससे काम की रफ्तार धीमी हो जाती है।
इसके विपरीत, ग्रीनफील्ड कॉरिडोर का निर्माण एकदम नए सिरे से होता है, जिससे इंजीनियरों को सड़क को बिल्कुल सीधा और चौड़ा बनाने की आजादी मिलती है। इससे न केवल निर्माण कार्य तेजी से पूरा होता है, बल्कि वाहनों के लिए सफर भी काफी छोटा और सुगम हो जाता है। आज के समय में 'दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे' और 'अमृतसर-जामनगर एक्सप्रेसवे' इसके सबसे शानदार उदाहरण हैं। ये कॉरिडोर उन नए इलाकों से होकर गुजरते हैं जहां पहले कोई बड़ी सड़क नहीं थी, जिससे उन क्षेत्रों के विकास के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।