Telangana electric buses: तेलंगाना सरकार सार्वजनिक परिवहन को हरित बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा रही है। 2027 तक हजारों डीजल बसों को इलेक्ट्रिक में बदला जाएगा, वो भी बिना नई बसें खरीदे। जानिए ये कैसे संभव होगा...
तेलंगाना में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए तेलंगाना स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (TGSRTC) ने बड़े पैमाने पर डीजल बसों को इलेक्ट्रिक में बदलने का कार्यक्रम शुरू किया है। सरकार दावा कर रही है कि ये भारत का पहला ऐसा व्यापक रेट्रोफिटिंग प्रोजेक्ट होगा, जिसमें मौजूदा डीजल बसों को ईवी टेक्नोलॉजी से अपग्रेड किया जाएगा।
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क्या है रेट्रोफिटिंग और क्यों है यह खास?
आमतौर पर नई इलेक्ट्रिक बसें खरीदना काफी महंगा सौदा होता है। रेट्रोफिटिंग (Retrofitting) एक ऐसी तकनीक है जिसमें मौजूदा डीजल बस के इंजन और फ्यूल टैंक को हटाकर उसकी जगह इलेक्ट्रिक मोटर और पावरफुल बैटरी पैक लगा दिया जाता है। इसका फायदा है कि बॉडी वही रहती है, लेकिन वह पूरी तरह जीरो एमिशन वाहन बन जाती है। इसके पहले 2023 में मुशीराबाद डिपो की एक बस को सफलतापूर्वक बदला गया था, जो आज भी उप्पल डिपो में शानदार प्रदर्शन कर रही है।
2027 तक 2,800 बसें होंगी इलेक्ट्रिक
TGSRTC के एमडी वाई नागी रेड्डी के अनुसार, कॉर्पोरेशन की योजना है कि 2027 तक 2,800 डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों में बदला जाए। इन बसों को मुख्य रूप से आउटर रिंग रोड हैदराबाद (ORR) की सीमाओं के भीतर चलाया जाएगा, ताकि शहर के मुख्य हिस्सों में प्रदूषण कम किया जा सके। इस प्रोजेक्ट पर करीब 392 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
अभी कितनी इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं?
वर्तमान में शहर के छह डिपो में 325 इलेक्ट्रिक बसें ऑपरेट हो रही हैं। इसी वर्ष 175 और बसें जोड़ी जाएंगी। यानी कुल इलेक्ट्रिक बेड़े में तेजी से विस्तार किया जा रहा है। ऐसे नई इलेक्ट्रिक बसें खरीदने की बजाय मौजूदा डीजल बसों को ईवी में बदलना लागत और संसाधनों की दृष्टि से अधिक किफायती माना जा रहा है।
ऑटो एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस कदम से कार्बन उत्सर्जन घटेगा, शहर में वायु गुणवत्ता बेहतर होगी, निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सकती है और श्वसन और हृदय रोगों के मामलों में कमी आ सकती है। अगर ये मॉडल सफल रहता है तो अन्य राज्य परिवहन निगम भी इसे अपना सकते हैं। इसके अलावा इसका आर्थिक फायदा भी संभव है। जैसे इलेक्ट्रिक बसों की रनिंग कॉस्ट डीजल बसों की तुलना में कम होती है। ईंधन खर्च में कमी, मेंटेनेंस लागत कम और लंबे समय में सरकारी सब्सिडी और कार्बन क्रेडिट का लाभ। इससे परिवहन निगम को वित्तीय स्थिरता भी मिल सकती है।