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भारत में कब से लागू होगा सैटेलाइट आधारित टोल टैक्स सिस्टम?: दूरी के हिसाब से कटेगा पैसा

Tue, 20 Oct 2026 07:49 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारत में आने वाले वर्षों में नेशनल हाईवे पर टोल टैक्स चुकाने का तरीका बदल सकता है। केंद्र सरकार 2028-29 तक चुनिंदा राष्ट्रीय राजमार्गों पर सैटेलाइट आधारित टोल सिस्टम शुरू करने की योजना बना रही है। जानें पूरी डिटेल्स।
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Satellite Toll Collection - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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भारत में हाइवे यात्रा को ज्यादा सुगम बनाने और टोल प्लाजा पर लगने वाले समय को पूरी तरह खत्म करने के लिए केंद्र सरकार एक बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, दो अधिकारियों ने बताया कि, सरकार 2028-29 तक चुनिंदा राष्ट्रीय राजमार्गों पर सैटेलाइट-आधारित टोल कलेक्शन सिस्टम पेश करने का लक्ष्य लेकर चल रही है।
  • जितना सफर, उतना टोल: इस नई तकनीक के लागू होने के बाद वाहन चालकों को टोल प्लाजा पर रुकने की आवश्यकता नहीं होगी। वर्तमान में लागू फिक्स्ड टोल टैक्स के बजाय चालक केवल उतनी ही दूरी का टोल देंगे, जितनी दूरी उन्होंने हाइवे पर तय की है।
  • मौजूदा प्रणालियों से अलग: वर्तमान में फास्टैग (FASTag) और मल्टी-लेन फ्री फ्लो (MLFF) सिस्टम में वाहनों की पहचान के लिए सड़कों पर गेंट्री और कैमरों की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, सैटेलाइट-आधारित टोलिंग सीधे वाहनों की लोकेशन को ट्रैक करके टैक्स की गणना करेगी। 

 

IIT कानपुर की भूमिका और इस तकनीक का रोडमैप क्या है?

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने इस दिशा में शोध करने और एक फुलप्रूफ सैटेलाइट टोलिंग सिस्टम तैयार करने के लिए IIT कानपुर में एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस स्थापित किया है।
  • तकनीकी जरूरतें: मंत्रालय की योजना भारत की 24x7 सैटेलाइट नेविगेशन क्षमताओं और तकनीकी तैयारियों के आधार पर 2028 तक चुनिंदा हाइवे स्ट्रेच पर इसे लागू करने की है।
  • पायलट प्रोजेक्ट के नतीजे: डेलॉयट इंडिया के पार्टनर कुशल कुमार सिंह के अनुसार, 2024 में स्वर्णिम चतुर्भुज के एक हिस्से पर इस तकनीक का पायलट टेस्ट किया गया था, जिसके नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे थे।

 

सैटेलाइट टोलिंग काम कैसे करेगी और इससे चालकों को क्या फायदा होगा?

  • ट्रैकिंग और चार्जिंग: GNSS (ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) सैटेलाइट पोजीशनिंग और कार में लगे कम्पैटिबल ऑन-बोर्ड डिवाइस (OBD) का उपयोग करके वाहन की मूवमेंट को ट्रैक करेगा।
  • सटीक दूरी का हिसाब: यदि कोई वाहन चालक किसी निर्धारित टोल प्लाजा से पहले ही हाइवे से उतर जाता है, तो उसे पूरे टोल का भुगतान नहीं करना पड़ेगा, बल्कि वह सिर्फ इस्तेमाल किए गए हिस्से का ही शुल्क देगा।
  • बिना रुके सफर: इससे टोल बूथों पर लगने वाली गाड़ियों की लंबी कतारों से मुक्ति मिलेगी और यात्रा के समय में भारी बचत होगी।

 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तकनीक का इस्तेमाल कहां-कहां हो रहा है?

सैटेलाइट आधारित दूरी-मुताबिक टोल प्रणाली का इस्तेमाल दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक किया जा रहा है:
  • जर्मनी: भारी मालवाहकों पर दूरी के हिसाब से टोल वसूलने के लिए सैटेलाइट पोजीशनिंग का इस्तेमाल करता है।
  • स्लोवाकिया और हंगरी: ये देश भी भारी वाहनों के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिस्टेंस-बेस्ड टोलिंग का उपयोग कर रहे हैं।
  • सिंगापुर: सिंगापुर 1 जनवरी 2027 से अपने मौजूदा गेंट्री-बेस्ड सिस्टम को हटाकर 'इलेक्ट्रॉनिक रोड प्राइजिंग 2.0' में पूरी तरह से शिफ्ट होने जा रहा है।

 

भारत में इस व्यवस्था को लागू करने में क्या चुनौतियां हैं?

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत का विशाल हाइवे नेटवर्क और वाहनों की विविधता इस बदलाव को थोड़ा जटिल बनाती है:
  • तकनीकी बाधाएं: टनल, पहाड़ी इलाकों और घने शहरी क्षेत्रों में सैटेलाइट सिग्नल कमजोर हो सकते हैं।
  • डेटा सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी: पीडब्ल्यूसी इंडिया के देवायन डे और ग्रांट थॉर्नटन भारत के भाविक वोरा के अनुसार, गोपनीयता, ऑन-बोर्ड डिवाइस की उपलब्धता, साइबर सुरक्षा, और गलत कटौतियों पर विवाद निवारण जैसे मुद्दों को पहले सुलझाना होगा।
  • चरणबद्ध चरण: 2028 की समयसीमा को पूरे देश में एक साथ लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से शुरू होने वाले पायलट विस्तार के रूप में देखा जाना चाहिए।
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