साइंस की कहानियों और अंतरिक्ष पर बनी फिल्मों में उड़ने वाली कारें हमेशा से इंसानी कल्पना और आकर्षण का केंद्र रही हैं। जब भी दुनिया में कोई बड़ी तकनीकी छलांग लगाती है तो 'फ्लाइंग कार' का सपना फिर से जी उठता है। हाल ही में टेस्ला रोडस्टर के नए मॉडल और स्पेसएक्स थ्रस्टर्स की घोषणा के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या सचमुच हमारी सड़कें आसमान से जुड़ने वाली हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह सपना कोई आज का नहीं है बल्कि इसके पीछे एक सदी से अधिक का संघर्ष, प्रयोग और रोमांचक इतिहास छिपा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि उड़ने वाली कारों को लेकर इतिहास में कब-कब और कैसे प्रयास किए गए हैं।
सन 1917 में विमानन इतिहास के शुरुआती पुरोधा ग्लेन कर्टिस ने दुनिया का पहला 'ऑटोप्लेन' मॉडल दुनिया के सामने पेश किया था. इसमें तीन पंखों वाली एक कार का ढांचा तैयार किया गया था। हालांकि यह मॉडल पूरी तरह से स्वतंत्र उड़ान भरने में सफल नहीं हो सका लेकिन इसने भविष्य के डिजाइनरों की कल्पना को एक नई उड़ान जरूर दी. साथ ही उड़ने वाली कारों की अवधारणा की एक मजबूत नींव रखी।
सन 1940 में ऑटोमोबाइल उद्योग के दिग्गज हेनरी फोर्ड ने एक ऐतिहासिक भविष्यवाणी की थी. उन्होंने कहा था कि एक दिन हवाई जहाज और कार का मेल जरूर बाजार में उतरेगा। उनकी इस बात ने कई इंजीनियरों को प्रेरित किया. जिसकी वजह से आगे चलकर साल 1946 में रॉबर्ट फुलटन ने 'एरोकार' या Airphibian विकसित किया जिसे अमेरिकी अधिकारियों से सड़क और आसमान दोनों जगह चलने की आधिकारिक मंजूरी भी मिली थी।
सन 1970 के दशक में इस क्षेत्र में एक काफी अनोखा और जोखिम भरा प्रयोग किया गया जब 1973 में 'एवे-मिजार' नामक हाइब्रिड प्रोजेक्ट ने सुर्खियां बटोरीं। इसमें एक लोकप्रिय कार 'फोर्ड पिंटो' के पिछले हिस्से में सेसना विमान के पंखों और इंजन को जोड़ा गया था लेकिन एक टेस्ट फ्लाइट के दौरान पंख टूट जाने से यह दुर्घटनाग्रस्त हो गई और इस प्रोजेक्ट पर रोक दिया गया।
2000 के दशक की शुरुआत के साथ ही नए सामानों और आधुनिक एवियोनिक्स के आने से इस तकनीक को नई जिंदगी मिल गई. इसके तहत 2006 में एमआईटी के इंजीनियरों ने 'टेराफुगिया ट्रांजिशन' की नींव रखी। यह एक ऐसी गाड़ी थी जिसके पंख एक बटन दबाकर मोड़े जा सकते थे ताकि इसे सड़क पर भी चलाया जा सके और इसी कड़ी में डच कंपनी 'पाल-वी' ने भी गाइरोकोप्टर जैसे मॉडल पेश किए।
हाल के वर्षों में एलन मस्क के नेतृत्व में टेस्ला रोडस्टर ने इस रेस को एक बिल्कुल नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। हाल ही में टेस्ला ने अपनी फ्लाइंग सुपर कार पेश भी कर दी है. अंतरिक्ष तकनीक से प्रेरित होकर इस सुपरकार में 'कोल्ड-गैस थ्रस्टर्स' और अंडरबॉडी सक्शन फैन को शामिल किया गया है। यह तकनीक कार को मात्र कुछ ही सेकंड में असाधारण रफ्तार देने के साथ-साथ सड़कों से कुछ इंच ऊपर 'होवर' करने यानी हवा में तैरने की क्षमता देती करती है। यह ऑटोमोबाइल और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग का अब तक का सबसे अनोखा कोलेब्रेशन माना जा रहा है।
हालांकि इस तकनीक का विकास बहुत रोमांचक है लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ा सवाल एयर ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा नियमों, ईंधन दक्षता और लाइसेंसिंग का है। यदि लाखों वाहन आसमान में उड़ने लगेंगे, तो उनके लिए ट्रैफिक नियम और एयर-कॉरिडोर्स तय करना सरकारों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा भारी लागत और मेंटेनेंस भी इसे फिलहाल आम आदमी की पहुंच से दूर रखती है।
ग्लेन कर्टिस के शुरुआती कर्टिस ऑटोप्लेन से लेकर आज के अत्याधुनिक टेस्ला रोडस्टर और स्पेसएक्स थ्रस्टर्स तक का सफर यह तो यह हो जाता है कि इंसान अपनी कल्पनाओं को सच में बदलने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। जो कभी एक असंभव कल्पना लगती थी, वह आज हकीकत की दहलीज पर खड़ी है। आने वाले कुछ वर्षों में जब सड़कों के साथ-साथ आसमान में भी अत्याधुनिक वाहनों की कतारें दिखेंगी, तो यह सदी के सबसे बड़े तकनीकी चमत्कारों में से एक होगा।