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'60 दिन में नौकरी ढूंढें या अमेरिका छोड़ें': टेक कंपनियों में छंटनी से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स संकट में

Thu, 21 May 2026 12:39 PM IST
Suyash Pandey टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

US Tech Layoffs 2026: अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों में जारी लेऑफ अब भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए सिर्फ नौकरी जाने का मामला नहीं रह गया है। बल्कि यह उनके पूरे भविष्य और अमेरिका में रहने के अधिकार पर भी असर डाल रहा है। मेटा, अमेजन और लिंक्डइन जैसी कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों की छंटनी की है। क्योंकि टेक इंडस्ट्री तेजी से एआई और ऑटोमेशन की ओर बढ़ रही है। इसका सबसे बड़ा असर H-1B visa पर काम कर रहे भारतीय कर्मचारियों पर पड़ रहा है। अमेरिकी नियमों के मुताबिक अगर किसी H-1B कर्मचारी की नौकरी चली जाती है तो उसके पास नई स्पॉन्सर कंपनी ढूंढने के लिए सिर्फ 60 दिन का समय होता है। अगर इस दौरान नई नौकरी नहीं मिलती तो उसे अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।
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टेक लेआऑफ (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार
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वर्षों से भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ने अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनियों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने वहां कोड लिखने से लेकर बड़ी टीमों का नेतृत्व करने तक का सफर तय किया, घर खरीदे और अपने परिवार बसाए।

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लेकिन अब हजारों भारतीयों के लिए सिर्फ एक ईमेल उनकी पूरी दुनिया बदल रहा है। दरअसल, अमेरिका की टेक इंडस्ट्री में चल रहे छंटनी के इस दौर ने वहां रह रहे भारतीय प्रोफेशनल्स के सबसे बड़े डर को फिर से जिंदा कर दिया है कि नौकरी जाने का सीधा मतलब अब अमेरिका में रहने के अपने अधिकार को खो देना है।
 

क्या है 60-दिन का H-1B नियम?

अमेरिका में काम करने वाले ज्यादातर भारतीय टेक प्रोफेशनल्स H-1B वीजा पर निर्भर होते हैं, जो सीधे तौर पर उनके नियोक्ता से जुड़ा होता है। अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों के अनुसार, अगर किसी कर्मचारी की नौकरी छूट जाती है तो उसे एक नया वीजा स्पॉन्सर ढूंढने के लिए केवल 60 दिनों का ग्रेस पीरियड मिलता है। गौर करने वाली बात यह है कि यह समय सीमा आखिरी सैलरी मिलने के दिन से नहीं, बल्कि ऑफिस में काम करने के आखिरी दिन से ही शुरू हो जाती है। 

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अगर इन 60 दिनों के भीतर कर्मचारी को कोई नया स्पॉन्सर नहीं मिलता तो उसे अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। आज के दौर में, जब टेक इंडस्ट्री में हायरिंग की रफ्तार धीमी है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की वजह से लगातार छंटनी हो रही है, तब इतने कम समय में नया स्पॉन्सर ढूंढना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।


सिर्फ नौकरी नहीं, दांव पर है पूरी जिंदगी

भारतीय कर्मचारियों के लिए नौकरी का जाना सिर्फ करियर के लिए एक झटका नहीं है। बल्कि यह समय के खिलाफ शुरू हुई एक ऐसी दौड़ है जो उनके पूरे जीवन को अस्त-व्यस्त कर देती है। इस अनिश्चितता के साथ कई गंभीर परेशानियां जुड़ी होती हैं। जहां एक ओर कई भारतीय वर्षों से ग्रीन कार्ड के इंतजार में अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते हैं।

वहीं नौकरी छूटते ही बच्चों के स्कूल, घर की ईएमआई और हेल्थकेयर जैसी बुनियादी जरूरतें अचानक दांव पर लग जाती हैं। इस स्थिति में सबसे अधिक चिंताजनक मानसिक तनाव होता है, क्योंकि अमेरिकी नागरिकों के विपरीत, विदेशी कर्मचारियों के सिर पर हमेशा अपने इमिग्रेशन स्टेटस को खोने की तलवार लटकती रहती है, जो उन्हें हर पल एक गहरे दबाव में जीने के लिए मजबूर कर देती है।


एआई ने कैसे बढ़ाई मुसीबत?

वर्तमान में सिलिकॉन वैली की दिग्गज कंपनियां कॉस्ट-कटिंग मोड में हैं। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण एआई का तेजी से बढ़ता प्रभाव है। मेटा जैसी कंपनियों का उदाहरण लें तो उन्होंने न केवल लगभग 8 हजार कर्मचारियों की छंटनी की है। बल्कि इस साल एआई पर $100 बिलियन से अधिक खर्च करने की योजना भी बनाई है।

इसी तरह, अमेजन और लिंक्डइन जैसी अन्य बड़ी टेक कंपनियां भी ऑटोमेशन और एआई के कारण अपनी टीमों को लगातार छोटा कर रही हैं। इस बदलाव ने कर्मचारियों के बीच एक गहरी चिंता पैदा कर दी है- उन्हें डर है कि यह छंटनी केवल एक अस्थायी दौर नहीं है। बल्कि एआई भविष्य में इंजीनियरिंग और सपोर्ट जैसे कई अहम रोल्स की मांग को हमेशा के लिए कम कर सकता है।


छंटनी के बाद क्या कर रहे हैं भारतीय? 

नौकरी जाने के बाद अमेरिका में रुकने और कानूनी तौर पर समय बचाने के लिए भारतीय कर्मचारी कई तरह के वैकल्पिक रास्ते अपना रहे हैं। इनमें सबसे प्रचलित तरीका B-2 विजिटर वीजा (टूरिस्ट वीजा) में स्विच करना है। इसके लिए कर्मचारी फॉर्म I-539 भरते हैं ताकि उन्हें नौकरी खोजने के लिए कुछ अतिरिक्त महीने मिल सकें। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन अब इन आवेदनों की बेहद सख्ती से जांच कर रहा है। 

इस अनिश्चितता के कारण कई लोग अब भविष्य के लिए नए विकल्प तलाश रहे हैं। एक हालिया सर्वे के मुताबिक लगभग 50% भारतीय प्रोफेशनल्स नौकरी जाने की स्थिति में वापस भारत लौटने पर विचार कर रहे हैं। वहीं कुछ लोग कनाडा और यूरोप जैसे देशों का रुख कर रहे हैं, जिन्हें वे अमेरिका के मुकाबले अधिक सुरक्षित और स्थिर विकल्प मान रहे हैं।


कंपनियां क्या दे रही हैं मुआवजा? 

एक रिपोर्ट के अनुसार, छंटनी की मार झेल रहे मेटा जैसे संस्थानों से निकाले गए कर्मचारियों को एक राहत पैकेज दिया जा रहा है। इसमें 16 हफ्ते की बेसिक सैलरी के साथ-साथ कंपनी में बिताए गए हर साल के लिए 2 हफ्ते की अतिरिक्त सैलरी शामिल है। इसके अलावा, कर्मचारियों और उनके परिवारों को 18 महीने तक का हेल्थकेयर कवरेज भी प्रदान किया जा रहा है।

हालांकि, यह वित्तीय पैकेज कुछ समय के लिए आर्थिक सहारा तो दे सकता है। लेकिन इमिग्रेशन और वीजा से जुड़ी अनिश्चितता ने कई भारतीय पेशेवरों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या अब वाकई अमेरिकन ड्रीम पहले जैसा सुरक्षित और भरोसेमंद रह गया है?

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