ऑटोमोबाइल जगत में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अब तक हमें ऐसी कारों की आदत थी, जिसमें हाथ स्टीयरिंग पर और आंखें सड़क पर होना जरूरी था, लेकिन अब फोर्ड, जीएम और होंडा जैसी कंपनियां लेवल-3 ऑटोनॉमस ड्राइविंग की ओर बढ़ रही हैं, जहां ड्राइवर कार चलाते समय लैपटॉप पर काम कर सकता है या टेक्स्ट मैसेज भेज सकता है। हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह आजादी बड़ी कानूनी और वित्तीय चुनौतियों के साथ आती है।
क्यों पीछे हट रहे हैं दिग्गज?
जहां फोर्ड 2028 तक किफायती लेवल-3 इलेक्ट्रिक कारें लाने का वादा कर रहा है, वहीं कई कंपनियां इससे पीछे हट रही है:
मर्सिडीज-बेंज और स्टेलेंटिस: इन दिग्गजों ने अपनी लेवल-3 योजनाओं को फिलहाल रोक दिया है। इसकी पीछे सीमित स्पीड, भौगोलिक पाबंदियां और कम मांग बड़े कारण माने जा रहे हैं। साथ ही लेवल-2 के मुकाबले लेवल-3 सिस्टम को विकसित करने का खर्च करीब 1.5 बिलियन (लगभग दोगुना) तक पहुंच जाता है।
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6 सेकंड का पेच: तकनीकी रूप से कार को किसी भी खतरे के समय में ड्राइवर को कम से कम 6 सेकंड पहले चेतावनी देनी होती है। हाइवे की रफ्तार पर यह दूरी एक फुटबॉल मैदान जितनी होती है, जिसे सटीक बनाना बेहद जटिल है।
क्रैश हुआ तो कौन फंसेगा?
लेवल-3 तकनीक में सबसे बड़ा ग्रे एरिया कानूनी जिम्मेदारी का है। अगर आंखें हटाकर काम कर रहे ड्राइवर की कार दुर्घटनाग्रस्त होती है, तो क्या जिम्मेदारी कार निर्माता की होगी या ड्राइवर की? इसपर ऑटो एक्सपर्ट कहते हैं कि ये जोखिम ऑटोमेकर्स को निवेश करने से डरा रहा है। टेस्ला फिलहाल लेवल-2 पर ही टिका है, जबकि उसका पूरा ध्यान अब सीधे रोबोटैक्सी (पूरी तरह ड्राइवरलेस) पर है।
चीन से मिलता कड़ा मुकाबला
वैश्विक बाजार में चीनी कंपनियां जैसे BYD और लीपमोटर गेम-चेंजर साबित हो रही हैं। चीन ने पिछले साल ही लेवल-3 कारों को मंजूरी दी है और वे बेस मॉडल में ही उन्नत फीचर्स देकर एक प्राइस वॉर छेड़ चुके हैं।
एक नजर में देखें ऑटोनॉमस ड्राइविंग के लेवल्स
| लेवल |
क्षमता |
ड्राइवर की भूमिका |
| लेवल 1 और 2 |
क्रूज कंट्रोल, लेन कीपिंग |
आंखें और हाथ सक्रिय होने चाहिए। |
| लेवल 3 |
खास परिस्थितियों में खुद ड्राइविंग |
आंखें बंद : ड्राइवर मल्टीटास्क कर सकता है लेकिन चेतावनी पर कंट्रोल लेना होगा। |
| लेवल 4 |
विशिष्ट क्षेत्रों में पूर्ण स्वायत्त |
ड्राइवर की जरूरत लगभग शून्य के बरारब होती है। |
| लेवल 5 |
कहीं भी, कभी भी पूर्ण ड्राइवरलेस |
कोई स्टीयरिंग व्हील की जरूरत नहीं होती। |
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इसके अलावा एक्सपर्ट्स कहते हैं कि
सेंसर टेक्नोलॉजी: लेवल-3 के लिए केवल कैमरों पर निर्भर रहना काफी नहीं है। इसके लिए LiDAR (लाइट डिटेक्शन एंड रेंजिंग) और हाई-डेफिनिशन मैप्स की जरूरत होती है, जो कार की कीमत को कई लाख रुपये बढ़ा देते हैं।
सॉफ्टवेयर अपडेट्स: कंपनियां अब सॉफ्टवेयर-डिफाइंड व्हीकल्स (एसडीवी) पर ध्यान दे रही हैं, ताकि भविष्य में ओवर-द-एयर (ओटीए) अपडेट से लेवल-2 कारों को लेवल-3 में अपग्रेड किया जा सके। हालांकि भारत जैसे जटिल ट्रैफिक वाले देशों में लेवल-3 का काम अभी कोसों दूर है, क्योंकि यहां सड़क चिह्नों की कमी और अनियंत्रित ट्रैफिक सबसे बड़ी बाधा है।