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Flex Fuel: मारुति और हीरो ले आए फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां, लेकिन क्या एथेनॉल से चलने पर घटेगा आपकी गाड़ी का खर्च?

Thu, 04 Jun 2026 06:04 PM IST
Suyash Pandey ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Flex Fuel Vehicle: पेट्रोल के बढ़ते खर्च और प्रदूषण को कम करने के लिए भारत में अब फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों का नया दौर शुरू हो रहा है। इसी कड़ी में कल यानी बुधवार को हीरो मोटोकॉर्प ने स्पेलेंडर प्लस फ्लेक्स फ्यूल और एचएफ डीलक्स फ्लेक्स फ्यूल मोटरसाइकिलों के रूप में लॉन्च किया था। और आज एक दिन बाद यानी गुरुवार को अब मारुति सुजुकी ने वैगन आर फ्लेक्स फ्यूल को लॉन्च किया है।
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फ्लेक्स फ्यूल - फोटो : एआई
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विस्तार
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भारत में एथेनॉल से चलने वाली गाड़ियों का चलन तेजी से बढ़ रहा है। हाल ही में हीरो मोटोकॉर्प ने अपनी स्लेंडर प्लस और एचएफ डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल लॉन्च किए हैं। आज आज उसके एक दिन बाद ही मारुति सुजुकी ने भी वैगन आर फ्लेक्स फ्यूल को पेश कर दिया है।

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इससे यह देश की पहली फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर कार बन गई है। लेकिन ये फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां आखिर हैं क्या? एथेनॉल ब्लेंडिंग किसे कहते हैं? सरकार इस पर इतना जोर क्यों दे रही है और क्या इससे आपकी जेब को फायदा होगा? आइए जानते हैं इस लेख के माध्यम से।


फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल क्या होता है?

एक फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल (जिसे FFV भी कहा जाता है) को इस तरह से डिजाइन किया जाता है कि वह पेट्रोल, एथेनॉल, या इन दोनों के मिश्रण पर आसानी से चल सके। यह आम पेट्रोल गाड़ियों के मुकाबले, फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल को झेल सकती हैं:

  • E20 फ्यूल: इसमें 20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है। (आजकल बिकने वाली ज्यादातर नई गाड़ियां इसी पर चलती हैं)।
  • E85 फ्यूल: इसमें 85% तक एथेनॉल होता है।
  • E100 फ्यूल: यह लगभग 100% शुद्ध एथेनॉल होता है।

 

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इंजन में क्या बदलाव होता है?

E85 और E100 जैसे हाई-एथेनॉल फ्यूल पर चलने के लिए कंपनियों को गाड़ियों में खास बदलाव करने पड़ते हैं। इनमें एथेनॉल-रजिस्टेंट (खराब न होने वाले) फ्यूल पाइप, खास फ्यूल पंप और इंजेक्टर का इस्तेमाल होता है। साथ ही, इनमें स्मार्ट सेंसर लगे होते हैं जो अपने आप पता लगा लेते हैं कि टंकी में कितना पेट्रोल और एथेनॉल है और उसी हिसाब से इंजन की परफॉर्मेंस सेट कर देते हैं।


एथेनॉल ब्लेंडिंग क्या है?

आसान शब्दों में कहें तो पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की प्रक्रिया को एथेनॉल ब्लेंडिंग कहते हैं। एथेनॉल एक तरह का बायोफ्यूल है जिसे गन्ने, मक्के और चावल जैसी फसलों से तैयार किया जाता है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।

क्योंकि एथेनॉल भारत में ही किसानों के जरिए पैदा किया जा सकता है, इसलिए सरकार इसे महंगे विदेशी तेल का सबसे अच्छा विकल्प मानती है। आपको बता दें कि 1 अप्रैल 2026 से पूरे भारत में E20 पेट्रोल स्टैण्डर्ड फ्यूल के तौर पर मिलना शुरू हो चुका है।

E20 के बाद अब आगे क्या?

अगला बड़ा कदम E85 और E100 फ्यूल है। यहीं पर फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां जरूरी हो जाती हैं। आम पेट्रोल वाली गाड़ियां E85 या E100 पर नहीं चल सकतीं, क्योंकि ज्यादा एथेनॉल से इंजन के पार्ट्स और रबर सील खराब हो सकते हैं। इसीलिए हीरो और मारुति की नई फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए एक बहुत बड़ा कदम हैं।


सरकार एथेनॉल पर इतना जोर क्यों दे रही है?

सरकार के इस कदम के पीछे तीन मुख्य कारण हैं:

  • पैसे की बचत: भारत हर साल कच्चा तेल मंगाने पर अरबों डॉलर खर्च करता है। एथेनॉल के इस्तेमाल से इस निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  • कम प्रदूषण: पेट्रोल के मुकाबले एथेनॉल ज्यादा साफ जलता है, जिससे गाड़ियों से निकलने वाला धुआं और प्रदूषण कम होता है।
  • किसानों को फायदा: एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने और मक्के की जरूरत होती है। इससे किसानों की फसल की डिमांड बढ़ेगी और ग्रामीण उद्योगों को सीधा फायदा मिलेगा।


क्या फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों से आपकी बचत होगी?

केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के मुताबिक, पेट्रोल के मुकाबले E85 फ्यूल काफी सस्ता होने की उम्मीद है। अगर ऐसा होता है तो रोजाना ज्यादा गाड़ी चलाने वालों को इसका सीधा फायदा मिलेगा।


लेकिन यहां एक कैच है:

एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले थोड़ी कम एनर्जी होती है। इसका सीधा मतलब है कि एथेनॉल पर चलने पर गाड़ी का माइलेज थोड़ा कम हो सकता है।

  • इसलिए, आपकी असली बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि:
  • E85 फ्यूल पेट्रोल से कितना सस्ता है।
  • आपकी गाड़ी का माइलेज कैसा है।
  • आपके इलाके में एथेनॉल पंप मौजूद हैं या नहीं।


क्या भारत E85 और E100 के लिए तैयार है?

भारत ने E20 का लक्ष्य तो हासिल कर लिया है, लेकिन E85 और E100 तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती है। सरकार की योजना अगले दो वर्षों में देश भर में लगभग 5 हजार E100 फ्यूल स्टेशन खोलने की है। हालांकि, इसे घर-घर तक पहुंचने में अभी वक्त लगेगा।

जब तक हाईवे और शहरों में एथेनॉल वाले पंप आसानी से हर जगह उपलब्ध नहीं हो जाते, तब तक ग्राहकों को फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ी खरीदने का 100% फायदा नहीं मिल पाएगा। बुनियादी ढांचा ही फिलहाल इस नई तकनीक की सबसे बड़ी चुनौती है।

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