क्या था मामला
यह मामला हरियाणा के जींद जिले में 4 जुलाई 2001 को हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने पीड़ितों को मुआवजा देने का आदेश दिया था और बीमा कंपनी को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। बीमा कंपनी को ड्राइवर से रकम वसूलने का अधिकार भी नहीं दिया गया था।
बीमा कंपनी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी कि ड्राइवर का लाइसेंस 4 जून 2001 को एक्सपायर हो गया था, जबकि दुर्घटना 4 जुलाई 2001 को हुई। लाइसेंस का नवीनीकरण बाद में 6 अगस्त 2001 को किया गया था, इसलिए कंपनी के अनुसार ड्राइवर वैध लाइसेंस के बिना वाहन चला रहा था।
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हाईकोर्ट ने क्या कहा
हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 14 के तहत लाइसेंस की एक्सपायरी के बाद 30 दिनों का वैधानिक ग्रेस पीरियड मिलता है। इस मामले में लाइसेंस 4 जून 2001 को समाप्त हुआ था और ग्रेस पीरियड 5 जून से शुरू होकर 4 जुलाई 2001 की आधी रात तक लागू था। दुर्घटना 4 जुलाई को सुबह करीब 10:45 बजे हुई, जो पूरी तरह से इस ग्रेस पीरियड के भीतर थी। ऐसे में लाइसेंस को दुर्घटना के समय वैध माना जाएगा।
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बीमा कंपनी को राहत क्यों नहीं मिली
कोर्ट ने माना कि ग्रेस पीरियड का मकसद ही यही है कि ड्राइवरों और दुर्घटना पीड़ितों को तकनीकी देरी के कारण नुकसान न उठाना पड़े। चूंकि कानून खुद इस अवधि में लाइसेंस को प्रभावी मानता है, इसलिए बीमा कंपनी यह नहीं कह सकती कि पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ है। इसी वजह से बीमा कंपनी को मुआवजा देने से बचने या ड्राइवर से रिकवरी का अधिकार नहीं दिया गया।
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पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है
यह फैसला पंजाब और हरियाणा में बाध्यकारी मिसाल बनेगा और देश के अन्य राज्यों में भी इसका प्रभाव पड़ेगा। अगर किसी दुर्घटना के समय ड्राइवर का लाइसेंस एक्सपायर हुए 30 दिन पूरे नहीं हुए हैं, तो बीमा कंपनियां केवल एक्सपायरी डेट का हवाला देकर दावा खारिज नहीं कर सकतीं। अब बीमाकर्ताओं को यह साबित करना होगा कि लाइसेंस पूरी तरह अवैध था, ड्राइवर अयोग्य था या कोई गंभीर नियम उल्लंघन हुआ था।
हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि यह फैसला लंबे समय से एक्सपायर लाइसेंस को वैध नहीं बनाता। ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण समय पर कराना अब भी जरूरी है। यह निर्णय केवल यह सुनिश्चित करता है कि छोटी प्रक्रियात्मक देरी के कारण लोगों को उनके हक के मुआवजे से वंचित न किया जाए।
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