क्या था पूरा E20 ईंधन विवाद और डॉक्टर की कार में क्या खराबी आई?
यह पूरा मामला रायपुर के रहने वाले 41 वर्षीय किडनी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रेमराज देवता से जुड़ा है। उन्होंने 3 जून 2024 को 18,29,000 रुपये में मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस (Grand Vitara Strong Hybrid Zeta Plus) मॉडल खरीदा था।
शिकायतकर्ता के अनुसार, गाड़ी में खराबी और धोखाधड़ी का घटनाक्रम कुछ इस प्रकार रहा:
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पुरानी कार को नई बताकर बेचना:
कोर्ट के आदेश के अनुसार, जो कार डॉ. प्रेमराज को जून 2024 में बिल्कुल नई कहकर बेची गई थी, वह वास्तव में जनवरी 2023 में बनी हुई थी। यानी बेचने से लगभग 17 महीने पहले की बनी कार उन्हें थमा दी गई थी।
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खरीद के समय जानकारी छुपाना:
शिकायत में आरोप लगाया गया कि कार बेचते समय ग्राहक को यह बिल्कुल नहीं बताया गया कि यह गाड़ी इथेनॉल-मिश्रित E20 पेट्रोल के साथ पूरी तरह से अनुकूल नहीं है।
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इंजन में बार-बार खराबी आना:
कार शुरुआत में करीब 21,913 किमी तक तो ठीक चली, लेकिन नवंबर 2024 में इसके डैशबोर्ड पर "इंजन प्रॉब्लम" की वार्निंग लाइट जल उठी। इसके बाद से ही गाड़ी का बार-बार बंद होना शुरू हो गया।
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डीलरशिप पर खड़ी रही गाड़ी:
डीलर के वर्कशॉप में बार-बार चक्कर काटने, फ्यूल टैंक की बार-बार सफाई करने और कई पार्ट्स बदलने के बावजूद गाड़ी ठीक नहीं हुई। आखिरकार, मार्च 2025 से डॉक्टर की कार डीलरशिप पर ही खड़ी रही और उन्हें इस्तेमाल के लिए एक अस्थायी लोनर कार दी गई।
डॉ. प्रेमराज ने आखिरकार इस मामले को लेकर रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (अतिरिक्त पीठ) में नेक्सा मैग्नेटो (स्काई ऑटो मोबाइल) डीलरशिप और मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।
मारुति सुजुकी और डीलर ने कोर्ट में क्या दलीलें दीं?
मारुति सुजुकी और डीलर ने अपने वकीलों के जरिए कोर्ट में शिकायत का पुरजोर विरोध किया। उनके मुख्य तर्क थे:
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खराब ईंधन को ठहराया जिम्मेदार:
दोनों प्रतिवादियों ने दावा किया कि गाड़ी में कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (उत्पादन संबंधी खराबी) नहीं था। बल्कि गाड़ी में मिलावटी या दूषित ईंधन डाला गया था।
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वारंटी के दायरे से बाहर:
उनका कहना था कि बाहरी ईंधन के कारण आई खराबी कार की वारंटी के तहत कवर नहीं होती है।
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लैब टेस्ट रिपोर्ट का हवाला:
मारुति सुजुकी ने कोर्ट में एक लैब टेस्ट रिपोर्ट भी पेश की, जिसमें दावा किया गया कि गाड़ी से निकाले गए ईंधन की गुणवत्ता काफी खराब थी।
उपभोक्ता आयोग ने मारुति सुजुकी को नई कार देने का आदेश क्यों सुनाया?
अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीज की पीठ ने इस मामले में शिकायत को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कार निर्माता और डीलर दोनों को 'सेवा में कमी' और 'अनुचित व्यापार व्यवहार' का दोषी पाया।
आयोग ने अपना फैसला सुनाते हुए ये टिप्पणियां और आदेश जारी किए:
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धोखाधड़ी और तकनीकी अक्षमता को माना आधार:
आयोग ने कहा कि गाड़ी जनवरी 2023 की बनी थी जो E20 ईंधन के अनुकूल नहीं थी। इसके बावजूद एक साल से अधिक समय बीतने के बाद भी ग्राहक को यह बात छुपाकर गाड़ी बेच दी गई। ऐसे में केवल बार-बार टैंक साफ करने या पार्ट बदलने से कार की यह समस्या ठीक नहीं हो सकती थी।
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45 दिनों में नई कार देने का आदेश:
आयोग ने मारुति सुजुकी और डीलर को आदेश दिया कि वे ग्राहक की पुरानी कार वापस लें और उन्हें आदेश के 45 दिनों के भीतर उसी मॉडल की एक बिल्कुल नई E20-अनुकूल कार सौंपें।
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कार न देने पर ₹20.50 लाख लौटाने का नियम:
यदि कंपनी तय समय में कार नहीं बदल पाती है, तो उन्हें डॉ. प्रेमराज को कार की पूरी कीमत और खर्चों के रूप में कुल 20,50,494 रुपये का भुगतान करना होगा।
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मानसिक प्रताड़ना और अदालती खर्च का मुआवजा:
गाड़ी बदलने के फैसले के अलावा, आयोग ने पीड़ित डॉक्टर को मानसिक प्रताड़ना के एवज में 1 लाख रुपये का मुआवजा और अदालती खर्च के रूप में 10,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया है। यह राशि भी 45 दिनों के भीतर देनी होगी, अन्यथा इस पर आदेश की तारीख से भुगतान के दिन तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।