इस रियायत का विरोध क्यों हुआ?
पुराने प्रस्ताव के तहत, छोटी कार बनाने वाली कंपनियों को प्रति वाहन 3 ग्राम/किमी का अतिरिक्त CO2 कटौती लाभ मिलने वाला था, जो प्रत्येक रिपोर्टिंग चक्र में 9 ग्राम/किमी तक सीमित था।
वजन-आधारित वर्गीकरण का विरोध करने वाले उद्योग विशेषज्ञों का तर्क था कि इस प्रणाली का दुरुपयोग हो सकता है।
उनका कहना था कि भारी वाहन बनाने वाली कंपनियां इंजीनियरिंग बदलावों के जरिए वजन कम करके इन रियायतों का लाभ उठा सकती हैं, जिससे कड़े उत्सर्जन मानकों का मकसद ही नाकाम हो जाएगा।
किन कंपनियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा?
मारुति सुजुकी, जिसके पास भारत में छोटी कारों का सबसे बड़ा पोर्टफोलियो है (वैगन आर, स्विफ्ट, डिजायर, इको और फ्रोंक्स, जो इसकी घरेलू बिक्री का लगभग 65 प्रतिशत हैं), सबसे अधिक प्रभावित हो सकती है।
इसी तरह, रेनो की काइगर और क्विड भी 1000 किलोग्राम से कम वजन श्रेणी में आती हैं।
हालांकि, टाटा मोटर्स, टोयोटा, ह्यूंदै, सिट्रोएन, निसान, जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर और किया जैसी कंपनियों ने वजन-आधारित वर्गीकरण का समर्थन नहीं किया था।
मानदंडों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया क्या है?
सूत्रों के अनुसार, 16 अप्रैल को विद्युत मंत्रालय द्वारा बुलाई गई बैठक अंतिम परामर्श होगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक सूत्र ने बताया कि 16 चर्चा बिंदुओं में से 14 पर सहमति बन गई है। वजन-आधारित वर्गीकरण और सुपर क्रेडिट पर असहमति थी।
हालांकि वजन-आधारित रियायत को हटा दिया गया है, लेकिन फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए मामूली संशोधनों के साथ सुपर क्रेडिट को ड्राफ्ट में बनाए रखा गया है।
नए मानक किन वाहनों पर लागू होंगे?
2027-32 के लिए प्रस्तावित कॉर्पोरेट औसत ईंधन खपत (CAFC) मानक, जिन्हें CAFE 2027 के रूप में जाना जाता है, M1 श्रेणी के वाहनों पर लागू होंगे।
इसमें नौ लोगों तक की बैठने की क्षमता और 3,500 किलोग्राम तक के सकल वाहन वजन वाली कारें शामिल हैं।
वजन-आधारित रियायतों के हटने से उन निर्माताओं पर लागत का दबाव बढ़ सकता है जो मुख्य रूप से एंट्री-लेवल और हल्की कारों पर निर्भर हैं।