अगर आप कार, एसयूवी या कोई भी वाहन इस्तेमाल करते हैं, तो आपने कुछ साल पहले BS-IV से सीधे BS-VI में हुए बड़े बदलाव को जरूर महसूस किया होगा। अब भारत सरकार प्रदूषण से निपटने के लिए इससे भी एक कदम आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। देश में जल्द ही BS-VII (भारत स्टेज 7) उत्सर्जन मानदंड लागू किए जाएंगे। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इसके लिए प्रस्तावित समयसीमा को हरी झंडी दे दी है और आने वाले कुछ ही दिनों में इसके लिए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर दिए जाएंगे।
यह नया ढांचा वैश्विक स्तर पर लागू हो रहे यूरो सात (Euro 7) मानकों के अनुरूप है। इसका सीधा मकसद नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), हाइड्रोकार्बन और पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे हानिकारक तत्वों को हवा में घुलने से रोकना है।
अप्रैल 2029 से 2035 तक: छह वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू होंगे नियम
BS-VI की तरह इस बार अचानक पूरा सिस्टम नहीं बदला जाएगा। इसके लिए वाहन निर्माता कंपनियों और टेस्टिंग एजेंसियों को तैयारी का पर्याप्त समय दिया जाएगा। कहा जा रहा है कि BS-VII नियमों को अप्रैल 2029 से अप्रैल 2035 तक कुल छह वर्षों में फेस में लागू किया जा सकता है, जो इस प्रकार हैं...
- अप्रैल 2029 से: सबसे पहले यह नियम नई बनने वाली कारों और एसयूवी (Cars and SUVs) पर लागू होगा।
- 2030 से: इसके बाद छोटे मालवाहक वाहन यानी की लाइट कमर्शियल डिलिवरी व्हीकल और पिक-अप वैन इसके दायरे में आएंगे।
- अप्रैल 2031 से: 2030 के बाद बसें और भारी वाणिज्यिक वाहन यानी हेवी कमर्शियल व्हीकल या ट्रक्स BS-VII के दायरे में लाए जाएंगे।
- दोपहिया वाहन: चूंकि बाइक और स्कूटर प्रदूषण में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं, इसलिए इनके लिए नियमों की घोषणा बाद में अलग से की जाएगी।
ईंधन नहीं, गाड़ियों की तकनीक में होंगे बड़े बदलाव
2020 में जब भारत ने BS-IV से सीधे BS-VI को अपनाया था, तब तेल रिफाइनरियों को ईंधन (पेट्रोल या डीजल) का फॉर्मूला बदलने के लिए अरबों रुपये का निवेश करना पड़ा था। लेकिन BS-VII में ऐसा नहीं होगा।
इस बार पेट्रोल और डीजल के फॉर्मूले में किसी बड़े बदलाव की जरूरत नहीं है। अब कंपनियों को सख्त उत्सर्जन सीमाओं को पूरा करने के लिए अपनी इंजन तकनीक, एग्जॉस्ट सिस्टम और कैटेलिटिक कनवर्टर जैसे एमिशन-कंट्रोल डिवाइसों को हाई-टेक बनाना होगा।
पहली बार टायरों और ब्रेक के धुएं या धूल पर भी लगेगी लगाम
वहीं, BS-VII नियमों की सबसे बड़ी खासियत है कि यह केवल साइलेंसर से निकलने वाले धुएं तक सीमित नहीं होने वाला है, बल्कि इन चीजों पर भी लागू होगा।
नॉन-एग्जॉस्ट एमिशन: जब हम गाड़ी चलाते हैं, तो ब्रेक दबाने पर ब्रेक पैड घिसते हैं और सड़क पर टायर घिसते हैं। इनसे भी बारीक हानिकारक धूल उड़ती है।
टायर और ब्रेक फ्रिक्शन पर नियंत्रण: BS-VII के तहत पहली बार टायर के घिसने और ब्रेक के घर्षण से होने वाले प्रदूषण के लिए सख्त सीमाएं तय की जाएंगी।
इसके अलावा, वाहनों की रियल-वर्ल्ड ड्राइविंग टेस्टिंग की जाएगी। यानी स्वतंत्र एजेंसियां सड़क पर चलती हुई गाड़ियों की रैंडम चेकिंग करेंगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि गाड़ी पूरे जीवनकाल में तय मानकों के अंदर ही प्रदूषण कर रही है।
ट्रकों और भारी वाहनों पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर
सड़कों पर चलने वाले भारी ट्रकों और कमर्शियल गाड़ियों से सबसे ज्यादा जहरीला धुआं निकलता है। नए BS-VII मानकों के आने से भारी कमर्शियल वाहनों से होने वाले विभिन्न प्रदूषकों के उत्सर्जन में 20 प्रतिशत से लेकर 50 प्रतिशत तक की बड़ी कटौती करने का लक्ष्य रखा गया है। ऑन-रोड रियल वर्ल्ड चेकिंग के जरिए इन आंकड़ों की पुष्टि की जाएगी।
आम जनता और खरीदारों पर क्या असर पड़ सकता है?
- साफ और शुद्ध हवा: जानकारों को अनुसार, इससे सड़कों पर चलने वाले वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण में भारी गिरावट आएगी, जिससे सांस की बीमारियों और जहरीले स्मॉग से राहत मिल सकती है।
- गाड़ियों की कीमत में बढ़ोतरी संभव: ऑटोमेकर्स को एडवांस इंजन और नए सेंसर्स लगाने होंगे, जिससे आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल कारों और खासकर डीजल ट्रकों की कीमतें बढ़ सकती हैं।
- ज्यादा टिकाऊ पार्ट्स: टायरों और ब्रेक पैड के घिसने से जुड़े नियम आने के बाद कंपनियां ज्यादा मजबूत और पर्यावरण-अनुकूल मटेरियल से बने टायरों का निर्माण करेंगी, जिससे इनकी लाइफ भी बढ़ सकती है।