क्या आपने भी देश में E20 पेट्रोल आने के बाद शोरूम से चमचमाती हुई नई कार खरीदी है? अगर हां, तो थोड़ा सावधान हो जाइए। आम तौर पर नई कार खरीदते समय लोग उसका मॉडल, वेरिएंट, रंग और रजिस्ट्रेशन की तारीख ही देखते हैं, लेकिन उसकी असली 'मैन्युफैक्चरिंग डेट' यानी बनने की तारीख को नजरअंदाज कर देते हैं। रायपुर उपभोक्ता अदालत के एक हालिया फैसले ने इस छिपी हुई तारीख को अचानक बेहद महत्वपूर्ण बना दिया है।
अदालत ने एक ग्राहक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि उसकी मारुति ग्रैंड विटारा कार E20 पेट्रोल के अनुकूल नहीं थी, क्योंकि उसका निर्माण सरकार की समय-सीमा से पहले हुआ था, भले ही उसे एक साल बाद शोरूम से 'बिल्कुल नई' कार कहकर बेचा गया था। हालांकि मारुति इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे रही है। लेकिन इसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, कि क्या देश में हजारों ग्राहकों ने अनजाने में ऐसी कारें तो नहीं खरीद लीं जो E20 ईंधन के लिए बनी ही नहीं थीं?
भारत में ईंधनों के बदलाव के दौरान एक बड़ा तकनीकी अंतर आया है, जिसे समझना हर कार मालिक के लिए जरूरी है:
1 अप्रैल 2023 की समय-सीमा:
सरकार ने नियम बनाया था कि 1 अप्रैल 2023 से BS6 फेज-II नियमों के तहत बनने वाली सभी नई यात्री गाड़ियों का इंजन E20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) के अनुकूल होना अनिवार्य है।
1 अप्रैल 2025 को पूर्ण बदलाव:
यह बदलाव 1 अप्रैल 2025 को तब पूरा हुआ जब देशभर के पेट्रोल पंपों पर E20 पेट्रोल को स्टैंडर्ड (डिफॉल्ट) ईंधन बना दिया गया।
पुराने स्टॉक का खेल:
कारें अक्सर बनने के कई महीनों बाद तक बिकती हैं। कंपनियां और डीलरशिप अपने पुराने स्टॉक को निकालने के लिए भारी डिस्काउंट देते हैं। चूंकि इन गाड़ियों का पहले कभी रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ होता, इसलिए इन्हें साल 2023 या 2024 में भी 'नई कार' कहकर ही बेचा जाता रहा।
अनजाने में पुराना मॉडल मिलना:
इसका मतलब यह है कि अगर किसी ने अप्रैल 2023 के बाद या 2024 में भी कोई नई कार खरीदी है, तो मुमकिन है कि उसे डिस्काउंट के चक्कर में 1 अप्रैल 2023 से पहले की बनी कार थमा दी गई हो। जो अनिवार्य E20 नियमों के तहत नहीं बनी थी।
JSW एमजी मोटर का उदाहरण:
उदाहरण के लिए, अप्रैल 2024 में JSW MG Motor India ने घोषणा की थी कि उनकी 'हेक्टर' (Hector) कार को E20 ईंधन पर चलने के लिए प्रमाणित किया गया है, ताकि सरकार के उस नियम का पालन हो सके जो 1 अप्रैल 2025 से बनने वाली सभी पेट्रोल गाड़ियों के लिए E20 अनुकूलता अनिवार्य करता है।
अगर आपने बदलाव के इस दौर में भारी छूट पर कोई कार खरीदी है, तो आपको अपनी गाड़ी के दस्तावेजों को दोबारा देखना चाहिए:
VIN प्लेट की जांच:
आपको अपनी कार की VIN (Vehicle Identification Number) (व्हीकल आइडेंटिफिकेशन नंबर) प्लेट या रजिस्ट्रेशन कागजातों पर जाकर यह देखना चाहिए कि कार वास्तव में किस महीने में बनी थी।
प्री-E20 बैच की पहचान:
अगर आपकी कार जनवरी, फरवरी या मार्च 2023 (या उससे पहले) की बनी है और आपने उसे खरीदा भले ही उसके कई महीनों बाद हो, तो वह 'प्री-E20' (इथेनॉल नियमों से पहले वाले) प्रोडक्शन बैच की हो सकती है।
खराबी आना जरूरी नहीं:
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपकी गाड़ी में खराबी आ ही जाएगी या वह असुरक्षित है। कई कार निर्माताओं ने तय समय-सीमा से बहुत पहले ही अपनी गाड़ियों में E20 अनुकूल पुर्जे लगाने शुरू कर दिए थे और कई मॉडल तय वक्त से पहले ही इसके लिए तैयार थे।
विवाद की स्थिति में हथियार:
हालांकि, अगर भविष्य में गाड़ी के इंजन या फ्यूल-सिस्टम में कोई खराबी आती है और कंपनी से कोई विवाद होता है, तो रायपुर कोर्ट के मामले की तरह आपकी गाड़ी के बनने की तारीख एक बेहद अहम कानूनी बिंदु साबित हो सकती है।
यह पूरा विवाद रायपुर के एक डॉक्टर की मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा हाइब्रिड कार से शुरू हुआ, जो इस समस्या का सटीक उदाहरण है:
जनवरी 2023 बनाम जून 2024:
यह कार जनवरी 2023 में फैक्ट्री में बनी थी, लेकिन शोरूम से इसे जून 2024 में बेचा गया।
बार-बार इंजन की शिकायत:
कार में जब बार-बार इंजन से जुड़ी दिक्कतें आईं, तो ग्राहक उपभोक्ता अदालत पहुंच गया। कोर्ट ने माना कि कार E20 अनुकूल नहीं थी और मारुति व डीलर को कार बदलने या पूरे पैसे रिफंड करने का आदेश दे दिया।
मारुति सुजुकी का कड़ा रुख:
मारुति सुजुकी अदालत के इन निष्कर्षों से पूरी तरह असहमत है। कंपनी का कहना है कि ग्रैंड विटारा पूरी तरह E20 अनुकूल है और इसका उल्लेख ओनर्स मैनुअल में भी है। कंपनी के मुताबिक खराबी इथेनॉल की वजह से नहीं, बल्कि मिलावटी ईंधन के कारण आई थी और वे इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील कर रहे हैं।
रायपुर उपभोक्ता अदालत का यह फैसला अभी कोई देशव्यापी मिसाल नहीं है और इस पर अपील होना बाकी है। फिर भी इसने एक छिपी हुई हकीकत को उजागर कर दिया है:
गुमराह होने का अंदेशा:
देश में जब E20 ईंधन लागू हो रहा था, तब डीलरशिप नए और पुराने दोनों तरह के स्टॉक को एक साथ बेच रहे थे। कई ग्राहकों ने बिना यह जाने कार की डिलीवरी ले ली कि उनकी गाड़ी 1 अप्रैल 2023 के शासनादेश से पहले के बैच की है।
डिलीवरी डेट नहीं, मैन्युफैक्चरिंग डेट ही होगी खूबी:
भविष्य में अगर किसी भी कार मालिक का फ्यूल सिस्टम को लेकर कंपनी से विवाद होता है, तो जांच का मुख्य बिंदु यह नहीं होगा कि कार किस दिन घर आई थी, बल्कि यह होगा कि कार किस दिन फैक्ट्री में बनी थी।
अगर आपने भी इस बदलाव के दौर में, खासकर भारी डिस्काउंट के साथ कोई "नई" कार खरीदी थी, तो आज ही चेक करें कि वह फैक्ट्री से कब बनकर निकली थी। वह तारीख आपके लिए कार शोरूम से घर लाने वाले दिन से कहीं ज्यादा कीमती हो सकती है।