केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 के तहत गाड़ियों के दरवाजों और विंडस्क्रीन पर काले या डार्क शीशे लगाना मना है। हालांकि, शीशों की विजिबिलिटी को लेकर कुछ मानक तय किए गए हैं। नियम के मुताबिक कार के दरवाजों के शीशे की विजिबिलिटी 50 फीसदी होनी चाहिए। जबकि, सामने और पीछे के शीशों की विजिबिलिटी 70 फीसदी होनी चाहिए।
कार के शीशों की विजिबिलिटी को नापने का एक ही तरीका है कि फिल्म पर लिखे गए विजिबिलिटी प्रतिशत को देखा जाए। यही कारण है कि कई लोग इसी का फायदा उठा कर बच जाते हैं।
दरअसल कार के शीशो पर लगाए जाने वाले फिल्म पर विजिबिलिटी का प्रतिशत लिखा होता है। लेकिन लोकल फिल्म पर आपको यह नहीं दिखाई देगा। ऐसे में हो सकता है कि जिस फिल्म को आप लगवाएं वो तय प्रतिशत से ज्यादा हो। लेकिन इसे चेक करने के लिए पुलिस को गाड़ी को रोकना होगा।
केंद्रीय मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 177 के तहत तय सीमा से ज्यादा शाशे के डार्क होने पर 100 रुपये का जुर्माना था। लेकिन मोटर वाहन संशोधन अधिनियम 2019 की तरफ से संशोधित दंड सूची के बाद, इसे बढ़ाकर 25 गुना कर दिया गया है। अब तय सीमा को पार करने पर 2500 रुपये का जुर्माना है।
अगर गाड़ी में लगे ग्लास की विजिबिलिटी केंद्रीय मोटर वाहन नियम 1989 की तय सीमा के अंदर है, तो फिर परेशानी की कोई बात नहीं है। लेकिन अगर यह तय सीमा से ज्यादा है, तो यह गैरकानूनी काम में गिना जाएगा। दरअसल कार के शीशे की विजिबिलिटी अगर तय सीमा से ज्यादा हुई, तो बाहर के शख्स को कार के अंदर की चीजें दिखाई नहीं देगी। इससे अगर कार के अंदर कोई भी गैरकानूनी काम हो रहा है, तो किसी को पता नहीं चल सकेगा। बदमाश अक्सर ऐसे शीशों का इस्तेमाल करके अपहरण के वारदात को अंजाम देते हैं।