वर्ष 2017-18 में हुई कार सेल्स के आंकड़ाें के अनुसार, पिछले साल के मुकाबले 10 फीसदी ज्यादा कारों ने सड़कों पर दस्तक दी। हालांकि मेट्रो शहरों में इनकी संख्या गिरी है, जिसकी एक बड़ी वजह पार्किंग स्पेस रहा। छोटे नगरों कस्बों में वाहनों की बढ़ती मांग तथा उपयोगिता वाहनों की बढ़ी लोकप्रियता के बीच मार्च को समाप्त बीते वित्त वर्ष में देश में यात्री वाहनों की बिक्री रिकार्ड रही।
पिछले साल में 7.89% बढोतरी के साथ लगभग 33 लाख वाहन बिके हैं। भारतीय वाहन विनिर्माताओं के संगठन सियाम के द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार वित्तवर्ष 2017-18 में यात्री वाहनों की घरेलू बिक्री 32,87,965 इकाई रही जो पूर्व वित्त वर्ष (30,47,582 वाहन) की तुलना में 7.89% अधिक है।
दरअसल यूरोपियन न्यू कार असेसमेंट प्रोग्राम की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी। यूरो एनकैप का काम है नई−नई कारों को तोड़ना। जी हां, कारों की मज़बूती उन्हें तोड़कर ही तो जांची जा सकती है, वहीं इस टेस्ट के तहत नई कारों को क्रैश-टेस्ट किया जाता है।
यह जानने के लिए कि वे कितनी सेफ हैं - ड्राइवर, पैसेंजर और यहां तक कि पैदल यात्रियों के लिए भी। इन्हीं पैमानों पर आमतौर पर पैसेंजर कारों और SUV का क्रैश टेस्ट होता है। जिसके तहत कारों को अलग-अलग एंगल से क्रैश किया जाता है। सभी टेस्ट क्रैश लैब में किए जाते हैं। ताकि टक्कर से जुड़े सभी आंकड़े रिकॉर्ड किए जा सकें।
इन पैमाने पर होता है टेस्ट
- फ्रंटल इम्पैक्ट, यानि सीधी टक्कर, जिसमें कार जाती है 64 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से और टकराती है अपने बराबर के वज़न वाले एक ढांचे से।
- साइड इम्पैक्ट (यानि साइड की टक्कर का टेस्ट)।
- पोल इम्पैक्ट (यानि खंभे या पेड़ से टक्कर) टेस्ट।
- पेडेस्ट्रियन प्रोटेक्शन जिसमें जांचा जाता है कि अगर कार किसी पैदल यात्री से टकरा जाए तो उन्हें कितना नुकसान पहुंचेगा।
टाटा की एसयूवी नेक्सन को भले ही एनकैप टेस्ट में पास कर दिया गया हो, लेकिन इससे पहले कई भारतीय कारें पूरी तरह से असफल साबित हुई हैं। पिछले कुछ सालों से अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारतीय कारों का क्रैश टेस्ट कर रही हैं।