उसने बताया कि टू-स्ट्रोक वाले दोपहिया वाहनों के लिए इस किट को बनाने में 2500 रुपये का खर्च करने पड़े, जबकि 500 रुपये और खर्च कर इसे फोर स्ट्रोक इंजन वाले दोपहिया वाहनों के लिए बनाया जा सकता है।
देवेंद्रिरन ने कहा कि अभी इस ईंधन से वाहन को 25 किलोमीटर तक चलाया जा सकता है, अब मैं इस डिवाइस की क्षमता को बढ़ाने पर काम कर रहा हूं। देवेंद्रिरन ने कहा कि इसका मूल्यांकन करने बाद इसे अनुसंधान और विकास के अगले स्तर पर ले जाने पर जोर दिया जाएगा।
देवेंद्रिरन ने बताया कि उन्होंने अपने शिक्षक-मार्गदर्शक एन. कोतेश्वरी और जी. मंजुला के साथ मिलकर एक टीम की तरह काम करके यह किट विकसित की है। इसमें नमक मिश्रित पानी से हाइड्रोजन को अलग किया जाता है।
देवेंद्रिरन ने बताया कि एक लीटर पानी में तीन चम्मच नमक मिलाया जाता है। इस पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को अलग करने के लिए उसे जस्ता (जिंक) और एल्यूमीनियम की प्लेटों के साथ रखा जाता है।
इससे इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस प्रक्रिया से पानी ईंधन टैंक में रहता है और हाइड्रोजन ऊपर एकत्र होती जाती है। एकत्र हुई हाइड्रोजन को ट्यूब के माध्यम से कार्बोरेटर में स्थानांतरित किया जाता है, जो इंजन को किकस्टार्ट करने में मदद करती है।
देवेंद्रिरन के स्कूल के हेडमास्टर आई. उमादेवन ने कहा कि इस किट में कुछ जरूरी सुधार करने के बाद इसे नेशनल डिजाइन एंड रिसर्च फोरम के विशेषज्ञों के सामने रखा जाएगा।
वीआईटी के चांसलर जी. विश्वनाथन ने मीडिया को बताया कि वे हाइड्रोजन-चालित वाहन के आविष्कार को अगले स्तर तक ले जाने के लिए ऐसे युवा छात्र-वैज्ञानिकों की अनुसंधान परियोजना को बढ़ावा देना चाहेंगे।
उन्होंने कहा कि इस तरह के आविष्कार आश्वस्त करते हैं कि हमें पेट्रोल का बेहतर विकल्प तलाशने के लिए जरूरी सफलता मिल सकती है। उन्होंने कहा कि मुझे इस बात की खुशी है कि एनडीआरएफ ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने में रुचि दिखाई है, यह समाज के लिए बहुत लाभदायक साबित होगी।