मांग की मजबूती और नीति समर्थन का असर
2025 में धीमी शुरुआत के बाद पैसेंजर व्हीकल सेगमेंट ने जबरदस्त वापसी की। शहरी इलाकों में मजबूत मांग, ग्रामीण आय में स्थिरता और फाइनेंस की बेहतर उपलब्धता ने बिक्री को सहारा दिया। सरकार की ओर से जीएसटी में सुधार, ब्याज दरों में नरमी और इनकम टैक्स राहत जैसे कदमों ने वाहनों की अफॉर्डेबिलिटी बढ़ाई, जिसका सीधा असर बिक्री पर दिखा। यही कारण है कि 2026 में भी उपभोक्ता मांग के टिके रहने की उम्मीद जताई जा रही है।
SUV, CNG और EV की बढ़ती हिस्सेदारी
बीते साल की तरह 2026 में भी एसयूवी सेगमेंट का दबदबा बना रहने की संभावना है। इसके साथ ही सीएनजी और इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी में धीरे-धीरे लेकिन लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। यह बदलाव किसी अचानक क्रांति की तरह नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से हो रहा है। जिसमें ग्राहक नई तकनीक को धीरे-धीरे अपनाते नजर आ रहे हैं। इससे यह साफ है कि भारतीय बाजार फिलहाल संतुलित ट्रांजिशन के दौर में है।
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2027 के नियमों से पहले तैयारी का साल
2026 को उद्योग एक ट्रांजिशन ईयर के तौर पर देख रहा है। 2027 से लागू होने वाले कड़े CAFE मानदंड और भविष्य के उत्सर्जन नियम कंपनियों के लिए लागत बढ़ाने वाले साबित हो सकते हैं। इसके अलावा, टू-व्हीलर सेगमेंट में एबीएस और सीबीएस जैसे अनिवार्य सेफ्टी फीचर्स एंट्री-लेवल कीमतों को ऊपर ले जा रहे हैं, जिसका असर कीमत-संवेदनशील ग्राहकों पर पड़ सकता है।
सप्लाई चेन और लागत का दबाव
हालांकि लोकलाइजेशन में सुधार हुआ है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता, टैरिफ, रुपये की कमजोरी और सप्लाई चेन में रुकावटें अब भी चुनौती बनी हुई हैं। खासतौर पर प्रीमियम और कंपोनेंट-इंटेंसिव वाहनों में लागत नियंत्रण और समय पर सप्लाई डीलर कॉन्फिडेंस बनाए रखने के लिए अहम होगी।
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निवेश की दोहरी रणनीति
ऑटो कंपनियां फिलहाल दोहरी रणनीति पर काम कर रही हैं। एक तरफ इलेक्ट्रिफिकेशन, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और नए प्लेटफॉर्म पर निवेश बढ़ाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर पारंपरिक पावरट्रेन की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है ताकि निकट भविष्य की मांग को पूरा किया जा सके। यह दर्शाता है कि बाजार पूरी तरह से एक दिशा में नहीं मुड़ा है, बल्कि धीरे-धीरे बदलाव के रास्ते पर है।
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उद्योग जगत की राय: सतर्क आशावाद
मारुति सुजुकी के एमडी और सीईओ हिसाशी ताकेउची का मानना है कि 2026 में जीएसटी सुधारों का पूरा असर दिखेगा और उद्योग 7-8 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है। वहीं डीलर्स संगठन फाडा के अनुसार, ग्रामीण मांग और शादी के सीजन का असर 2026 की शुरुआत तक बना रह सकता है। हालांकि जनवरी से संभावित कीमत बढ़ोतरी चिंता का विषय है।
SIAM और ACMA जैसे उद्योग संगठनों का भी मानना है कि घरेलू मांग और लोकल मैन्युफैक्चरिंग से ग्रोथ को सहारा मिलेगा। जबकि निर्यात में भी दोहरे अंकों की बढ़त संभव है। टाटा मोटर्स, महिंद्रा, टोयोटा और अन्य कंपनियां एसयूवी, सीएनजी और ईवी सेगमेंट में अपनी मजबूत स्थिति को 2026 में और भुनाने की तैयारी में हैं।
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संतुलित लेकिन चुनौतीपूर्ण साल
कुल मिलाकर 2026 भारतीय ऑटो इंडस्ट्री के लिए उम्मीदों से भरा लेकिन संतुलन की मांग करने वाला साल होगा। मांग और नीतिगत समर्थन जहां मजबूती देंगे, वहीं बढ़ती लागत, नियमों की तैयारी और उपभोक्ताओं की कीमतों के प्रति संवेदनशीलता उद्योग की दिशा तय करेगी। यह साल तय करेगा कि भारत की ऑटो इंडस्ट्री आने वाले दशक के लिए कितनी मजबूत नींव तैयार कर पाती है।
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