अनीता जैन, वास्तुविद
Vastu Tips : प्रत्येक वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत होती है, जिसका समापन आश्विन माह की अमावस्या को होता है। यह अवधि पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में यमराज सभी पितरों को पृथ्वी पर छोड़ देते हैं, ताकि वे अपनी संतान से श्राद्ध के निमित्त भोजन ग्रहण कर लें। इस माह में श्राद्ध न करने वालों के पितर उन्हें श्राप देकर पितृ लोक चले जाते हैं। इससे आने वाली पीढ़ियों को कष्ट उठाना पड़ता है। इसे ही पितृदोष कहते हैं।
पितृजन्य समस्त दोषों की शांति के लिए पूर्वजों की मृत्यु तिथि के दिन श्राद्ध-कर्म किया जाता है। इसमें ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। गरुण पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध-कर्म करने से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, मोक्ष, स्वर्ग, कीर्ति, बल, वैभव, सुख, धन और धान्य वृद्धि का आशीष प्रदान करते हैं। मान्यता है कि श्राद्ध-कर्म द्वारा ही पुत्र अपने जीवन में पितृ ऋण से मुक्त हो सकता है। इसलिए पुत्र-पौत्रादि का यह कर्तव्य होता है कि वह पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक ऐसे शास्त्रोक्त कर्म करे, जिससे उन मृत प्राणियों को परलोक अथवा अन्य लोक में भी सुख प्राप्त हो सके।