भानु सप्तमी का पर्व आषाढ़ मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान सूर्यदेव की पूजा वरूण रूप में की जाती है। इस वर्ष यह पर्व 25 जून रविवार को उत्तराभाद्रपद नक्षत्र और शोभन योग में मनाया जाएगा। रविवार के दिन भानु सप्तमी होने के कारण इस दिन का महत्व सूर्य उपासना के लिए और भी बढ़ जाता है। मान्यता है कि भानु सप्तमी पर किया गया पूजन अत्यंत फलदाई है। जिन जातकों की कुंडली में सूर्य अशुभ फल दे रहा हो उनको इस दिन सूर्य भगवान की पूजा करने के बाद आदित्य हृदय स्रोत का पाठ करना चाहिए। सूर्यदेव की कृपा से व्यक्ति को लंबी आयु, आरोग्य, धन-धान्य में बढ़ोत्तरी, यश-कीर्ति, विद्या, भाग्य और पुत्र, मित्र व पत्नी का सहयोग प्राप्त होता है।
पूजा विधि
सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और उसके बाद तांबे के लोटे में जल भरें और उसमें लाल चन्दन, चावल, लाल फूल डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें। जल चढ़ाते समय सूर्य के वरूण रूप को प्रणाम करते हुए ऊं रवये नम: मंत्र का जाप करें। अंत में भगवान सूर्य को पृथ्वी पर झुककर प्रणाम करें और अर्घ्य को अपने मस्तक पर लगाएं। इसके बाद भगवान से शक्ति, बुद्धि, स्वास्थ्य और सम्मान की कामना करनी चाहिए। इस प्रकार जल चढ़ाने के बाद धूप, दीप से सूर्य देव का पूजन करें।
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दान करें
सूर्य से संबंधित चीजें जैसे तांबे का बर्तन, पीले या लाल कपड़े, गेहूं, गुड़, लाल चंदन का दान करें। श्रद्धानुसार इनमें से किसी भी चीज का दान किया जा सकता है। इस दिन सूर्यदेव की पूजा के बाद एक समय फलाहार करें।
सूर्य पूजा के फायदे
सुबह उगते हुए सूर्य को प्रणाम करने या जल चढ़ाने से मन में आत्मविश्वास बढ़ता है एवं सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। सप्तमी तिथि पर सूर्य को जल चढ़ाने और पूजा करने से रोग दूर होती हैं। भविष्य पुराण में श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र को सूर्य पूजा का महत्व बताया है। श्रीकृष्ण ने कहा है कि सूर्य ही एक प्रत्यक्ष देवता हैं। यानी ऐसे भगवान हैं जिन्हें रोज देखा जा सकता है। पुराणों के अनुसार इस सप्तमी को जो भी सूर्य देव की उपासना तथा व्रत करते है,उनके सभी रोग ठीक हो जाते हैं। श्रद्धा के साथ सूर्य पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं एवं इनकी पूजा से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। शास्त्र के अनुसार सूर्य के कमजोर होने के कारण व्यक्ति को नेत्र रोग,अस्थि रोग और त्वचा रोग आदि होते हैं।उसका आत्मबल कमजोर रहता है तथा पिता से सम्बन्ध भी ठीक नहीं रहते अतः ऐसे व्यक्ति के लिए सूर्योपासना करना विशेष लाभकारी होता है।नेत्र रोग से मुक्ति के लिए नित्य प्रति चाक्षुषोपनिषद का पाठ करना चाहिए।