शनि देव करेंगे कुंभ राशि में प्रवेश
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शनि के कुंभ में प्रवेश के बाद बदलेगा सांसारिक परिदृश्य
शनि देव अपनी मूल त्रिकोण राशि कुंभ में प्रवेश कर रहे हैं, कुंभ का शाब्दिक अर्थ घट, घड़ा, मटका या कलश होता है। भारतीय वैदिक संस्कृति में घट स्थापन श्रेष्ठ कार्य माना गया है और आमतौर से किसी भी कर्मकाण्ड में घट स्थापन का मतलब वरुण स्थापन माना जाता है जो कि पंचतत्त्वों में से एक हैं और वरुण देवता को द्वादश आदित्यों में से एक माना गया है। जब पूजा-पाठ में कलश स्थापना करते हैं तो उस कलश के अन्दर नदियों का जल, सप्त सागरों का जल डाला जाता है। कलश के चारों वेदों के नाम का तिलक लगाया जाता है और वरुण देवता के आह्वान के साथ घट स्थापना की जाती है।
नवरात्रि की पूजा भी ऐसे ही प्रारम्भ की जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि कुम्भ राशि से घट स्थापना का संकेत मिलता है और भारतीय संस्कृति की पहचान और यज्ञ संस्कृति की पहचान घट स्थापना से ही होती है। अब जब कि शनि अपनी ही राशि कुम्भ को समृद्ध करने आ रहे हैं तो घट का अर्थात् वैदिक संस्कृति का प्रभुत्व बढ़ने का समय भी आ रहा है।
शनि के कुंभ राशि में प्रवेश करने के बाद सांसारिक परिदृश्य बदलेगा। धर्म, अध्यात्म, संस्कृति की ओर जनमानस का विशेष चिंतन होगा। धार्मिक शोध होंगे जिनके माध्यम से व्याधियों के निराकरण की राह निकलेगी। वहीं, व्यवसायिक उपक्रमों में परिवर्तन के साथ-साथ सेवा कार्य के क्षेत्र में भी पदों की बढ़ोतरी होने से रोजगार के अवसर मिलेंगे। 17 जनवरी से धनु राशि वालों की साढ़ेसाती से तथा मिथुन और तुला राशि के लोगों को ढैय्या से मुक्ति मिलेगी। इस दौरान शनि 140 दिनों तक वक्री रहेंगे जबकि और 39 दिनों तक अस्त रहेंगे।