क्या ऐसे शब्द भी होते हैं जो शब्दकोशों में दर्ज न हों! जवाब है बिल्कुल होते हैं और ‘ठुल्ला’ भी एक ऐसा ही शब्द है जो इन दिनो चर्चा में है। हिन्दी क्षेत्र में ‘ठुल्ला’ शब्द से खाकी वर्दी पहने ऐसे पुलिस वाले की छवि दिमाग में कौंधती है जो तुंदियल है। मैली, सिलवटदार वर्दी पहने, पान चबाए लापरवाह मुद्रा में या तो कुर्सी पर पसरा है या चौराहे पर किसी न किसी को ताड़ रहा है।
सामान्यतौर पर आम लोग सिपाही से लेकर कांस्टेबल और हेडसाब तक को इस शब्द के दायरे में रखते हैं। किसी भी शब्द में अर्थस्थापना समाज में उसके प्रयोग से तय होती है। इस तरह ‘ठुल्ला’ शब्द की अर्थवत्ता अगर निर्धारित ही करनी हो तो कामचोर, निष्क्रिय, लापरवाह और जबर्दस्ती रौब गालिब करने का आदी पुलिसवाला है। “ठुल्लों के पास क्या काम!” जैसा जुमला भी इस सिलसिले में अक्सर सुनने में आता है।
हिन्दी वाले ‘ठुल्ला’ शब्द पर बात करने से पहले पंजाबी के ‘टुल्ला’ को समझने की कोशिश करते हैं। अविभाजित भारत में पंजाबी का दायरा बेहद बड़ा था। कह सकते हैं कि पंजाब के धुर दक्षिण- पश्चिम क्षेत्र सिन्ध तक पंजाबी पसरी थी। इसी तरह धुर उत्तर में जिसे आज हिमाचल प्रदेश कहते हैं, वहाँ तक पंजाबी पहुँचती थी।
‘टुल’, ‘टोल’, ‘टुल्ला’ जैसे शब्द पंजाबी में हैं जिनके अर्थ अलग-अलग हैं। उनमें एक अर्थ गिल्ली-डण्डा खेल की शब्दावली में है। गिल्ली को डण्डे से कस कर मारने को ‘टुल लगाना’ भी कहते हैं। इस तरह ‘टुल्ला’ यानी डंडा हुआ।
‘टुल्ला’ का प्रचलन पाकिस्तान तक
- फोटो : बीबीसी
अनेक सन्दर्भ बताते हैं कि पंजाबी की देसी जबान में पुलिस वाले को ‘टुल्ला’ कहते हैं (ठुल्ला नहीं)। गौरतलब है कि इसका प्रचलन पाकिस्तान तक है। इसकी तस्दीक मुझे एक पाकिस्तानी ऑनलाइन समूह के विमर्श से हुई। अंग्रेजों के जमाने से पुलिस का अर्थ डंडा ही था।
कानून का डंडा, जो पुलिस के हाथ में रहता है उसे ही देसी जबान में ‘टुल्ला’ कहा जाता रहा। इसी वजह से पंजाबी में पुलिस को ‘टुल्ला’ भी कहा जाने लगा। एक सम्भावना यह है कि दिल्ली तक वही ‘टुल्ला’ चला आया है और यहाँ तक आते-आते वह ‘ठुल्ला’ हो गया।
पंजाबी ‘टुल्ला’ के मूल में ‘तुल’ धातु है जिसमें तौलना, ऊपर उठाना जैसे भाव हैं। ‘तुल’ से बने टुल, टुल्ल या टोल में तौल कर मारने का भाव पुष्ट होता है। गौर करें, फेंकी जाने वाली चीज को पहले हाथों से तौला जाता है। गुल्ली को पहले डण्डे से ऊपर उछाला जाता है।
अगले पायदान पर गुल्ली को डंडे से उछाला जाता है। दरअसल यही तौल है। उसके उछाल को तौल कर खिलाड़ी डंडे से कस कर प्रहार करता है और गुल्ली दूर तक उड़ती है। इसे ही कस कर टुल्ला मारना कहते हैं। स्पष्ट है कि तौलने वाली चीज ही डंडा है, तौल कर मारने वाली चीज भी डंडा ही है। यूँ भी तराजू में डंडा ही खास है। तौल में बेईमानी के लिए भी डण्डी मारना मुहावरा इसीलिए बना है।
क्रिकेट में भी होता था इस शब्द का प्रयोग
क्रिकेट के आगमन के बाद बल्लेबाज को ‘टुल्लेबाज’ और बल्लेबाजी को ‘टुल्लेबाजी’ कहा जाने लगा। ख्यात भाषाविद् बदरीनाथ कपूर के कोश में ‘टुल्ला उड़ाना’ मुहावरे का जिक्र है जिसका अर्थ गुल्ली, गेंद आदि को बल्ले या डण्डे से हवा में उछालना बताया गया है।
मराठी में भी ‘टोलेबाजी’ यानी बल्लेबाजी ही है। स्पष्ट है कि टुल्ला मूलतः डंडे के अर्थ में प्रयुक्त है और इस तरह देखें तो ब्रिटिश काल में ‘टुल्ला’ की वजह से पुलिस के सिपाही को भी ‘टुल्ला’ कहा जाने लगा क्योंकि उसके हाथ में दंड होता था।
सवाल उठता है हिन्दी का ‘ठुल्ला’ आया कहाँ से? हमारा मानना है हिन्दी का ‘ठुल्ला’ मुमकिन है कि पंजाब ‘टुल्ला’ से प्रभावित हो किन्तु यह निहायत हिन्दी की ज़मीन पर हिन्दी मूल से ही पैदा हुआ है- बतर्ज पंजाबी ‘टुल्ला’। इसे समझना इतना मुश्किल नहीं।
ज़रा गौर करें तो ‘ठुल्ला’ के बरअक्स हिन्दी का ‘ठलुआ’ दिमाग़ में कौंधता है जिसका अर्थ है ऐसा व्यक्ति जिसके पास कोई काम न हो। इसी तरह ‘निठल्ला’ भी है। यह भी बेकार, फालतू, बेरोज़ग़ार के अर्थ में प्रयुक्त होता है।
यूँ ‘निकम्मा’ के अर्थ में भी ‘निठल्ला’ का प्रयोग होता है किन्तु ‘निकम्मा’ दरअसल कामचोर या बेमतलब का आदमी होता है जबकि ‘निठल्ला’ वह व्यक्ति है जिसके पास कोई काम न हो। किन्तु आजकल निठल्ला ही निकम्मा है और निकम्मा ही निठल्ला भी।
ṭhalla का अर्थ है खाली, अनुत्पादक, दरिद्र या वित्तहीन, दीन, हीन
आजादी के बाद हर क्षेत्र में आयी गिरावट का ग्राफ सबसे ज़्यादा कानून की हिफाजत करने वाले अमले में देखने को मिला। जैसा कि हम कह चुके हैं कि सबसे निचली पायदान वाले पुलिसकर्मी की छवि ठलुए और निठल्ले की बनती चली गई। यही छवि पुलिस थानों की भी है।
थाना वह स्थान जहाँ पहले ही सताए हुए आम आदमी का और शोषण होना है- निठल्ली, कामचोर और नियमों में उलझाने वाली व्यवस्था के जरिये जिसे अंजाम देता है निचले दर्जे का पुलिसवाला। अर्दली, सिपाही, हवलदार, थानेदार आदि।
प्राकृत का एक शब्द है ‘ठल्ल’। रॉल्फ लिली टर्नर की अ कम्पैरिटिव डिक्शनरी ऑफ इंडो-आर्यन लैंग्वेजेज में ṭhalla की प्रविष्टि है जिसका अर्थ है खाली, अनुत्पादक, दरिद्र या वित्तहीन, दीन, हीन। जाहिर है जो बेकार या बेरोजगार हो वही ‘ठल्ल’ है।
इस रूप में भी निचले दर्जे के पुलिसकर्मी की शिनाख्त होती है। टर्नर पंजाबी में इसका एक अर्थ रुकावट या अवरोध भी बताते हैं। देखा जाए तो निचले स्तर पर पुलिस का चरित्र फरियादी को न्याय दिलाने में अड़ंगे लगाने का ही होता है, क्योंकि वह प्रभावशाली पक्ष के लिए काम करती है।
ठलुआ > ठुलआ > ठुल्ला
प्राकृत ‘ठल्ल’ से ही हिन्दी में निठल्ला, ठलुआ, ठाला जैसे शब्द बने। हिन्दी क्षेत्र में आते-आते पंजाबी का ‘टुल्ला’ निहायत देसी अंदाज वाले ‘ठुल्ला’ में बदल गया और इसकी अर्थस्थापना भी बैटन, स्टिक या डंडे वाले पुलिसकर्मी के स्थान पर निठल्ले, निष्क्रिय कारिंदे के तौर पर हुई। जिसके पास करने को कुछ न हो, जो बेवजह सबको हड़काता फिरता हो, जिसे लोगों को ताड़ने (प्रताड़ित करने में भी) मजा आता हो।
पंजाबी ‘टुल्ला’ से हटकर अगर देखें तो ‘ठुल्ला’ का विकास मेरे विचार में ‘ठलुआ’ से संभव है। स्वर विपर्यय के ज़रिये बड़ी आसानी से ठलुआ > ठुलआ > ठुल्ला जैसे विकासक्रम की कल्पना की जा सकती है।
जरूरी नहीं कि ऐसा ही हो। इसके बावजूद ‘ठुल्ला’ शब्द के दायरे में जो अर्थ छटाएँ हैं वह प्राकृत के ‘ठल्ल’ से आ रही हैं, यह तय है। हिन्दी क्षेत्र का ‘ठुल्ला’, पंजाबी की तर्ज पर जरूर बना है, मगर पंजाबी का नहीं है। हाँ, हिन्दी वाले ठुल्ला को आज भी तलाश है उसी रौब-दाब वाले टुल्ला की जिसके हाथ में कानून का डंडा है।