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सूर्य ग्रहण खत्म: इस ऋषि के पास था सबसे पहले ग्रहण का ज्ञान, जानिए प्राचीन मान्यताएं

Fri, 13 Jul 2018 10:46 AM IST
ज्योतिष डेस्क,अमर उजाला
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13 जुलाई को साल का दूसरा सूर्य ग्रहण अब खत्म हो गया। सुबह करीब 7 बजे चांद सूर्य और पृथ्वी का बीच आने पर आंशिक सूर्य ग्रहण दिखाई दिया। भारत में ग्रहण का काल समाप्त हो गया है। अब इसके बाद 11 अगस्त 2018 को साल का तीसरा सूर्य ग्रहण लगेगा। लेकिन क्या आपको मालूम है सबसे पहले  इस खगोलीय घटना का के बारे में दुनिया को किसने परिचित करवाया था। ये थे अत्रिमुनि। वैदिक काल में ही हमारे ऋषियों और मुनियों ने खगोलीय संरचना का सम्पूर्ण ज्ञान हासिल कर लिया था।  इन ऋषियों ने सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण और हर साल होने वाली खगोलीय संरचना की गणना बहुत पहले ही बता दी थी। ऋग्वेद के अनुसार सबसे पहले अत्रिमुनि को पास समस्त खगोलीय संरचना का ज्ञान मौजूद था। महर्षि अत्रि मुनि ग्रहण के ज्ञान को देने वाले प्रथम आचार्य थे।

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ग्रहण की धार्मिक मान्यताएं और वैज्ञानिक आधार

-ऋषि-मुनियों ने सूर्य ग्रहण लगने के समय भोजन के लिए मना किया है।  इसके पीछे कारण शास्त्रों में कारण बताया है क्योंकि ग्रहण के समय में कीटाणु आसपास फैल जाते हैं। जिसकी वजह से खाने की चीजों और पानी में छोटे- छोटे कीटाणु  पहुंचकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिए ऋषियों ने खाने के चीजों में कुश या तुलसी के पत्ते डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु इसमें एकत्रित हो जायें और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके।

- शास्त्रों में ग्रहण के बाद गंगा जल से नहाने को कहा गया है क्योंकि ग्रहण होने की वजह से वातावरण में कीटाणु बढ़ जाते हैं। गंगाजल में तमाम तरह के औषधि गुण होते है जिसकी वजह से  स्नान से शरीर के अंदर ऊष्मा का प्रवाह बढ़ता है, जिससे भीतर और बाहर के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
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- ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन-शक्ति कमज़ोर हो जाती है, जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच होकर शारीरिक या मानसिक हानि पहुँचा सकता है। ग्रहण लगने से दस घंटे पूर्व से ही इसका कुप्रभाव शुरू हो जाता है। जिसे सूतक काल कहा जाता है।

-  ग्रहण से हमारी जीवन शक्ति कमजोर होने लगती है। शास्त्रों में इसके लिए तुलसी के पत्तों का उपयोग बताया गया है।  तुलसी में औषधि गुण और प्राण शक्ति सबसे अधिक होती है, इसलिए  ग्रहण काल में इसके दोष को खत्म करने के लिए भोजन और पेय सामग्री में तुलसी के कुछ पत्ते डाल दिए जाते हैं ।

 -चंद्र ग्रहण के समय कफ की प्रधानता बढ़ती है और मन की शक्ति क्षीण होती है, जबकि सूर्य ग्रहण के समय , नेत्र तथा पित्त की शक्ति कमज़ोर पड़ती है। गर्भवती स्त्री को सूर्य-चंद्र ग्रहण नहीं देखने चाहिए, क्योंकि उसके दुष्प्रभाव से शिशु अंगहीन होकर विकलांग बन सकता है, गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है। इसके लिए गर्भवती के उदर भाग में गोबर और तुलसी का लेप लगा दिया जाता है, जिससे कि राहु-केतु उसका स्पर्श न करें।  ग्रहण के समय में मंत्रों का जाप करने से सिद्धि प्राप्त होती है।  ग्रहण समाप्त हो जाने पर स्नान करके गरीबों को दान देने का विधान है। 

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