सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत से संतान सुख और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। व्रत का पूर्ण फल पाने के लिए पढ़ें पुत्रदा एकादशी की पावन व्रत कथा।
सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इसे पवित्रा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति मिलती है। व्रत का महत्व समझने के लिए आइए जानते हैं राजा महीजित और महर्षि लोमेश से जुड़ी यह पावन कथा।
राजा महीजित को था संतान न होने का दुख
प्रजा पहुंची महर्षि लोमेश के पास
राजा की परेशानी देखकर प्रजा, ब्राह्मण और पुरोहित उनके लिए उपाय खोजने निकल पड़े। काफी तलाश के बाद उन्हें महान तपस्वी महर्षि लोमेश के दर्शन हुए। वे धर्म और शास्त्रों के ज्ञाता तथा तीनों कालों का ज्ञान रखने वाले ऋषि माने जाते हैं। प्रजा ने उन्हें राजा की परेशानी बताई और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि लोमेश कुछ समय ध्यान में लीन रहे और फिर राजा के पिछले जन्म की घटना के बारे में बताया।
पिछले जन्म के कर्म से जुड़ा था संतान न होने का कारण
पुत्रदा एकादशी का व्रत बताया उपाय
राजा की प्रजा ने महर्षि से इस पाप के निवारण का उपाय पूछा। तब लोमेश ऋषि ने बताया कि सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी मनोवांछित फल देने वाली है। उन्होंने प्रजा को श्रद्धा और विधि-विधान से इस एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। प्रजा ने ऋषि की बात मानकर पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और पूरी श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा की। उन्होंने रात्रि में जागरण किया और व्रत से प्राप्त पुण्य राजा महीजित को समर्पित कर दिया।
राजा को मिला संतान सुख
पुत्रदा एकादशी के व्रत का पुण्य राजा को मिलने के बाद उनकी रानी ने गर्भ धारण किया। उचित समय पर उन्होंने एक स्वस्थ और बलवान पुत्र को जन्म दिया। इस प्रकार राजा महीजित का वर्षों पुराना दुख दूर हुआ और उन्हें संतान सुख की प्राप्ति हुई।