पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती ने 4 अप्रैल को श्रीनगर में सुबह 10 बज कर 59 मिनट पर जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री पद की शपत ग्रहण की। उनके पिता मुफ्ती मुहम्मद सईद की इस वर्ष 7 जनवरी को हुई मृत्यु के बाद से सूबे में सरकार बनने को लेकर पीडीपी और बीजेपी में काफी मतभेद चल रहे थे। तीन महीने तक चले मंथन के बाद महबूबा मुफ्ती ने फिर से बीजेपी के साथ सरकार बनने की हामी भरी और आज वह राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल कर चुकी हैं।
किन्तु ज्योतिष के दृष्टिकोण से पीडीपी और बीजेपी की इस सरकार का गठन एक अशुभ महूर्त में हुआ है। पीडीपी की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और बीजेपी के उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने जब शपत ग्रहण की तो चन्द्रमा कुम्भ राशि में गोचर कर रहे थे। अभी कुछ दिन पूर्व 9 मार्च को कुंभ राशि में सूर्य ग्रहण पड़ा था। हिन्दू ज्योतिष के नियमों के अनुसार जिस राशि में ग्रहण पड़ा हो उस राशि को तीन महीने तक शुभ कार्यो के महूर्त के लिए नहीं लेना चाहिए।
दोनों दलों के बीच जल्द ही बड़े मतभेद सामने अाएंगे
महबूबा मुफ्ती और राज्यपाल एनएन वोहरा
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कुंभ राशि पर वर्तमान में मंगल की पाप दृष्टि पड़ रही है जो की हिंसा और युद्ध के कारक ग्रह माने जाते हैं। अत इस योग के प्रभाव से पीडीपी-बीजेपी सरकार को जम्मू-कश्मीर में अलगावादियों के हिंसक विरोध प्रदर्शनों से जल्द ही परेशानी का सामना करना पड़ेगा। शपथ ग्रहण कुंडली में छठे भाव में शनि और मंगल की युति दोनों दलों के बीच जल्द ही बड़े मतभेद उजागर करेगी।
श्मीरी पंडितों के पुनर्वास, धारा 370 , आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट और राष्टवाद के मुद्दे पर पीडीपी और बीजेपी के नेता आने वाले कुछ दिनों में उलझते दिख सकते हैं।
मिथुन लग्न की इस शपत ग्रहण कुंडली में सूर्य का दशम भाव में उच्च के शुक्र से युक्त होना जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार को केंद्र से एक बड़े आर्थिक पैकेज के मिलने का ज्योतिषीय संकेत है। लग्नेश बुध की लाभ भाव में मजबूत स्थिति भी इसी ओर इशारा कर रही है।
राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के लिए सिरदर्द बनेगी यह बात
महबूबा मुफ्ती और अमित शाह
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किन्तु 22 मई 1959 को जन्मी महबूबा मुफ्ती इस समय शनि की साढ़े-साती के प्रभाव में चल रही हैं, जो की उनको इस अवसर का पूरा लाभ नहीं लेने देंगे। महबूबा की जन्म राशि वृश्चिक में चल रहे शनि और मंगल का गोचर उनके लिए इस वर्ष सितंबर तक विशेष रूप से कष्टकारी है।
मंगल के 17 अप्रैल को वक्री होने से 29 जून तक इसी अवस्था में रहने के दौरान जम्मू-कश्मीर राज्य में सीमापार आतंकवाद और अलगावादियों के विरोध-प्रदर्शनों में अचानक तेजी देखी जाएगी जो की राज्य और केंद्र दोनों सरकारों के लिए सिरदर्द बन सकती है।