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Kartik Purnima 2025: आखिर क्यों खास है कार्तिक पूर्णिमा, जानिए गंगा स्नान से दीपदान तक का दिव्य उत्सव

Sun, 02 Nov 2025 01:10 PM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Kartik Purnima 2025: शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
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कार्तिक पूर्णिमा - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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Kartik Purnima 2025: कार्तिक मास की पूर्णिमा को कार्तिक पूर्णिमा, त्रिपुरी पूर्णिमा या गंगा स्नान के नाम से भी जाना जाता है। बारह मासों में कार्तिक मास आध्यात्मिक और शारीरिक ऊर्जा संचय के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। स्वयं नारायण ने भी कहा है कि “माहों में, मैं कार्तिक माह हूँ।”इस माह की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को शास्त्रों ने ‘अति पुष्करिणी’कहा है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो प्राणी कार्तिक मास में प्रतिदिन स्नान करता है, वह यदि केवल इन तीन तिथियों में सूर्योदय से पूर्व स्नान करें तो भी पूर्ण फल का भागी हो जाता है।
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त्रयोदशी से पूर्णिमा तक का पुण्यकाल
शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व बताया गया है। माना जाता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से पूरे वर्ष गंगा स्नान करने का फल मिलता है। इस दिन गंगा सहित पवित्र नदियों एवं तीर्थों में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। पूर्णिमा को स्नान, अर्घ्य, तर्पण, जप-तप, पूजन, कीर्तन एवं दान-पुण्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद श्री सत्यनारायण कथा का श्रवण, गीता पाठ, विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ व ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करने से प्राणी पापमुक्त व कर्जमुक्त होकर विष्णु की कृपा पाता है।

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गंगा स्नान और पुष्कर तीर्थ का विशेष महत्त्व
इसी दिन ब्रह्मा जी का ब्रह्म सरोवर पुष्कर में अवतरण हुआ था। इस दिन तीर्थयात्री पवित्र पुष्कर सरोवर में स्नान करके देवों की कृपा पाते हैं। आज ही के दिन भगवान् शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, जिससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिवजी को ‘त्रिपुरारी’ नाम दिया, जो शिव के अनेक नामों में से एक है।
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त्रिपुरारी शिव और मत्स्य अवतार की कथा
पुराणों के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने धर्म और वेदों की रक्षा के लिए मत्स्य अवतार धारण किया था। इसके अतिरिक्त आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी को पुनः जागते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागरण से प्रसन्न होकर देवताओं ने पूर्णिमा को लक्ष्मी-नारायण की महाआरती करके दीप प्रज्वलित किए।

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देवों की दीपावली और सद्गुणों का संदेश
यह दिन देवताओं की दीपावली है। इस दिन दीपदान व व्रत-पूजा आदि करके हम भी देवों की दीपावली में शामिल होते हैं ताकि हम अपने भीतर देवत्व धारण कर सकें, अर्थात् सद्गुणों को अपने अंदर समाहित कर सकें। देवों की दीपावली हमें आसुरी प्रवृत्तियों अर्थात दुर्गुणों को त्यागकर सद्गुणों को धारण करने के लिए प्रेरित करती है। नारद पुराण के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा पर सम्पूर्ण सद्गुणों की प्राप्ति एवं शत्रुओं पर विजय पाने के लिए कार्तिकेय जी के दर्शन करने का विधान है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए इस दिन आसमान के नीचे सायंकाल घरों, मंदिरों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीप प्रज्वलित करने चाहिए, गंगा आदि पवित्र नदियों में दीपदान करना चाहिए। 
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