द्वितीय एवं अष्टम भाव गुरु- जिस जातक की कुण्डली में गुरु द्वितीय एवं अष्टम भाव में विराज मान हो तो ऐसे जातक पूर्व जन्म में सन्त या सन्त श्रेणी का इन्सान था। पूर्व जन्म में कुछ इच्छाओ की पूर्ति न होने के कारण इन्हें वापस लेना पड़ता है, इन्हें मृत आत्माओं का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है।
तृतीय भाव में गुरु- जिस जातक की जन्म कुंडली में गुरु तृतीय भाव में विराजमान हो तो यह प्रतीत होता है, कि उसका जन्म परिवार के किसी पूर्वज पतिव्रता महिला के आशीर्वाद के स्वरूप होता हैं। इसका जीवन सुखमय व्यतीत होता है।
चतुर्थ भाव में गुरु- जिस जातक की जन्म कुंडली में गुरु चतुर्थ भाव में विराजमान हो तो ऐसा जातक अपने ही परिवार का पूर्व सदस्य होता है। इस जातक का अपनें ही परिवार में पुनर्जन्म होता है। पूर्वजों के आशीर्वाद द्वारा जन्म होने पर सुख भोगते हैं, और पूर्वजों के शाप द्वारा जन्म होने पर दुख तकलीफ भोगते हैं पूरा जीवन भयमुक्त व्यतीत होता है।
पंचम भाव में गुरु- जिस जातक की जन्म कुंडली में गुरु पंचम भाव एवं एकादश भाव में विराजमान हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में तंत्र-मंत्र-यंत्र तथा गुप्त विद्या का जानकार था,पूर्व जन्म में अपने स्वार्थ हेतु गलत कार्य तथा दुष्ट आत्माओं के सहारे कार्य किया होता है, वे ही आत्माएं इस जीवन में परिवार सुख में बाधा पहुंचाने का कार्य करती हैं, जिससे इनको मानसिक अशान्ति बनी रहती हैं। गुरु के साथ अगर राहु विराजमान हैं तो विशेष परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
द्वादश भाव में गुरु - जिस जातक की जन्म कुंडली में गुरु द्वादश भाव में विराजमान हो तो गुरु की स्थिति तथा गुरु राहु की युति हो तो ऐसा जातक धार्मिक स्थलों को तोड़ने के पाप (दोष) से ग्रसित होता है। इस जन्म में उपयुक्त दोष को भोगना पड़ता है। ऐसे जातक को गलत खान-पान से बचना चाहिए। अन्यथा हानि होती हैं।