Shani Dev: वैदिक ज्योतिष में शनि और गुरु ग्रह का विशेष स्थान होता है। दोनों ही ग्रहों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर गहरा पड़ता है। शनि ग्रह सभी ग्रहों में सबसे मंद गति से चलने वाले ग्रह माने जाते हैं। कालपुरुष की कुंडली में शनि दसवें और ग्यारहवें भाव के स्वामी होते हैं। दसवां भाव यानी कर्म का भाव और ग्यारहवां भाव आय का भाव होता है। वहीं शनि कुंडली के 6, 8 और 11 भाव के स्वामी ग्रह होते हैं। शनि को दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। कुंभ और मकर राशि के स्वामी शनिदेव हैं। शनि तुला राशि में उच्च के होते हैं जब मेष राशि में नीच के होते हैं। शनि को तीन दृष्टियां प्राप्त है। तीसरी, सातवीं और दसवीं दृष्टि। शनि के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में साढ़ेसाती और ढैय्या का सामना करना पड़ता है। शनि को न्यायाधीश, कर्मफलदाता और क्रूर ग्रह माना जाता है। यह व्यक्ति को उनके अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर फल प्रदान करते हैं। जातकों की कुंडली में शनि किस स्थान पर बैठे हैं यह बहुत ही महत्वपूर्ण होता है।