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ज्योतिष, व्रत-त्योहार और ग्रहण में क्यों है चंद्रमा का महत्व

Thu, 13 Feb 2020 02:01 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला
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ज्योतिष और धर्म में चंद्रमा का विशेष महत्व है। वहीं अगर खगोल विज्ञान की बात की जाय तो चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। जन्म कुंडली में सभी 12 भावों में चंद्रमा की अलग-अलग स्थिति से व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन,माता और सुख-शांति का कारक होता है। कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा होता है। इसके अलावा यह रोहिणी, हस्त और श्रवण नक्षत्र का स्वामी होता है। सभी ग्रहों में चंद्रमा के गोचर की समयावधि सबसे कम होती है। यह सवा दो दिन में ही एक राशि से दूसरी राशि में गोचर करता है। 

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वैदिक ज्योतिष शास्त्र में किसी व्यक्ति का राशिफल को मालूम करने के लिए चंद्र राशि को ही आधार माना जाता है। किसी बालक के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में स्थित होता है वह उसकी चंद्र राशि कहलाती है। सनातन परंपरा में तमाम देवी-देवताओं की तरह चंद्रदेव भी पूज्य हैं। 

चंद्रमा के जन्म को लेकर तमाम तरह की पौराणिक कथाओं का जिक्र मिलता है। मत्स्य एवं अग्नि पुराण में चंद्रदेव के जन्म की कथा के अनुसार एक बार जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने का विचार आया तो उन्होंने उससे पहले मानस पुत्रों की रचना की। इन्हीं मानस पुत्रों में से एक ऋषि अत्रि का विवाह ऋषि कर्दम की कन्या अनुसुइया से हुआ था। जिनसे दुर्वासा, दत्तात्रेय व सोम नाम के तीन पुत्र हुए। मान्यता है कि सोम चन्द्रदेव का ही एक नाम है और वह इन्हीं दोनों की संतान हैं। 
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चंद्रगहण को लेकर क्या कहता है धर्म और विज्ञान

धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब अमृत निकला तो उसे लेने के लिए देवताओं और दानवों के बीच लड़ाई होने लगी। देवताओं को मिले अमृत पर दानव भी हक जता रहे थे। इस विवाद को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी नाम की सुंदर कन्या का रूप धारण उसका बंटवारा करने की बात कही। 

जब मोहिनी के वेष में भगवान विष्णु देवताओं की पंक्ति में अमृत बांट रहे थे तो राहु नामक असुर भी उनके बीच जाकर चुपचाप बैठ गया। लेकिन इस बात की भनक भगवान सूर्यदेव और चंद्रदेव को लग गई। हालांकि तब तक देर हो चुकी थी और राहु ने अमृत प्राप्त कर लिया था, लेकिन उसी समय भगवान विष्णुने अपने सुदर्शन चक्र से उसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी। 

अमृत पीने के कारण वह मरा नहीं और उसका सिर और धड़ राहु और केतु नामक छाया ग्रह के रूप में स्थापित हो गए। धार्मिक मान्यता के अनुसार राहु और केतु के कारण ही चंद्रग्रहण और सूर्य ग्रहण की घटना घटती है। 

हालांकि विज्ञान के अनुसार जब सूर्य की परिक्रमा करती हुई पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है तो चंद्रमा पर पड़ने वाली सूर्य की किरणें नहीं पहुंच पाती हैं और उस पर पृथ्वी की छाया पड़ने लगती है। जिसके कारण चांद दिखना बंद हो जाता है और यह खगोलीय घटना चंद्रग्रहण कहलाती है। 

 धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण के दौरान चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए। खुली आंख से तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। 

चंद्रग्रहण के दौरान सबसे ज्यादा सावधानी गर्भवती महिलाओं को रखनी चाहिए। ग्रहण काल के दौरान उन्हें खुले आसमान के नीचे नहीं जाना चाहिए और न ही चंद्रग्रहण देखना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे उनके गर्भस्थ शिशु पर विपरीत पड़ सकता है। बल्कि चंद्रगहण से बचाव के लिए उन्हें अपने पास श्रीफल या अर्थात् एक नारियल रखना चाहिए। मान्यता है कि इस उपाय को करने से गर्भवती महिला पर वायुमंडल से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव नहीं पड़ता है। 

चंद्रग्रहण के दौरान खाना भूलकर भी न बनाएं और न ही बने हुए खाने को गर्म करें या फिर उसे छौंक लगाएं। 

धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण के दौरान सुई में धागा डालना, काटना-छीलना आदि भी निषेध है। 

ग्रहण के समय पति और पत्नी को शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए। मान्यता है कि इस दौरान यदि गर्भ ठहर जाए तो होने वाली संतान विकलांग या मानसिक रूप से विक्षिप्त तक हो सकती है।

ग्रहण के समय कोई भी शुभ व नया कार्य शुरू नहीं करना चाहिए।

चंद्रग्रहण के दौरान अपने पूज्य गुरु, ब्राह्मण, पुरोहित अथवा जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान-दक्षिणा देने का विशेष विधान है। ग्रहण का सूतक लगने के बाद आप अनाज, पुराना पहना हुआ कपड़ा आदि निकाल कर रख लें और उसे ग्रहण के पश्चात् दान कर दें। इस उपाय को करने से चंद्रग्रहण का दोष दूर होगा और चंद्रदेव की कृपा प्राप्त होगी। 

चंद्रग्रहण के दौरान बजाय बातचीत, तर्क-कुतर्क आदि करने के ध्यान-साधना करना अति उत्तम माना गया है। 

चंद्रग्रहण के पश्चात् किसी पवित्र सरोवर, नदी या फिर घर में स्नान करना शुभ होता है। मान्यता है कि ग्रहण के बाद स्नान करने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। 

चंद्रग्रहण का असर न सिर्फ मनुष्यों, जीव जंतुओं और प्रकृति पर पड़ता है, बल्कि घर में रखे भोज्य एवं पेय पदार्थों पर भी पड़ता है। ऐसे में उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए उसमें ग्रहण से पहले तुलसी के पत्ते डालने का विधान है। इस परंपरा के पीछे धार्मिक विद्वानों का तर्क है कि तुलसी में पारा होता है। ऐसे में उसके ऊपर किसी भी किरणों का कोई असर नहीं होता है। चूंकि चंद्रग्रहण के समय पराबैंगनी किरणों सबसे ज्यादा बुरा असर होता है, इसलिए खाने में तुलसी का पत्ते रखने से वह निष्क्रिय हो जाती हैं। वहीं धार्मिक दृष्टि से तुलसी के पौधे को पवित्र मानते हुए सभी दोषों को दूर करने वाला माना गया है। मान्यता है कि यह सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा खत्म कर देती है। इसीलिए ग्रहण से पहले खाने-पीने की चीजों में तुलसी की पत्ती डालने का विधान है।

शास्त्रों में कहा गया है कि ग्रहण काल में स्नान, ध्यान, दान, मंत्र जप, स्तोत्र-पाठ, मंत्रसिद्धि, तीर्थस्नान, हवन-कीर्तन का विशेष फल है। इन सभी चीजों को करने से जीवन से जुड़ी बाधाएं दूर होती हैं और सुखों की प्राप्ति होती है। चन्द्रग्रहण के समय अपने आराध्य देवी-देवता के मंत्र का जाप करने से न सिर्फ आप ग्रहण के दुष्प्रभाव से बच सकते हैं, बल्कि उनकी कृपा भी प्राप्त कर सकते हैं। मंत्र सिद्धि के लिए तो यह सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। चंद्रग्रहण के समय इन मंत्रों का करें जाप -
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चंद्रदेव का मंत्र — ॐ ऐं ह्रीं सोमाय नमः।
महादेव का मंत्र — ॐ नम: शिवाय।
भगवान विष्णु का मंत्र — ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम:।
देवी दुर्गा का मंत्र —  'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।
हनुमान जी का मंत्र — ॐ रामदूताय नम:।
मां लक्ष्मी का मंत्र — ॐ श्रीं ह्लीं क्लीं ऐं ॐ स्वाहा:।
श्रीकृष्ण का मंत्र —  क्लीं कृष्णाय नम:।

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