भगवान श्री कृष्ण अपने मुकुट में मोर पंख लगाते थे, इस कारण से कृष्ण भगवान को मोर मुकुटधारी भी कहा जाता है। लेकिन रामचन्द्र जो कृष्ण की तरह ही विष्णु के अवतार माने जाते हैं, मोर मुकुट नहीं धारण करते थे। शास्त्रों के अनुसार विष्णु के अब तक दस अवतार हो चुके हैं मगर कृष्ण के अलावा किसी अन्य ने मोर मुकुट नहीं धारण किया।
कई कथाओं में यह जिक्र आया है कि कृष्ण भगवान को मोर पंख बहुत पसंद था इसलिए वह सदैव मोर पंख मुकुट में सजाए रखते थे। जबकि कुछ ज्योतिषशास्त्री इसका कारण कृष्ण की कुण्डली में मौजूद दोष मानते हैं। कुण्डली में मौजूद दोष के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए कृष्ण हमेशा मोर पंख को अपने सिर पर रखते थे।
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विनोद त्यागी के अनुसार 1967 में सोलन में आयोजित एक ज्योतिषीय सम्मेलन में कृष्ण के कुंडली दोष पर विस्तार से चर्चा हुई थी। वहां पहुंचे एक जैन ज्योतिषी का मानना था कि कृष्ण अपनी कुण्डली में मौजूद कालसर्प योग के अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए मोर मुकट धारण किया करते थे।
जैन ज्योतिषियों ने यह भी बताया कि कालसर्प योग के सारे लक्षण कृष्ण के जीवन में नजर आते हैं। जेल में जन्म होना इसके बाद माता-पिता से दूर रहना कालसर्प का प्रभाव है।
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कालसर्प का एक प्रभाव यह भी होता है कि व्यक्ति 36 वर्ष के बाद सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्राप्त करता है लेकिन उसका उपभोग नहीं कर पाता है। कृष्ण ने भी 36 वर्ष के बाद सभी प्रकार का ऐश्वर्य हासिल कर लिया लेकिन कभी उनका सुख नहीं मिला।